लोकसभा चुनाव 2019-मुलायम के साथ नजर नहीं आएंगे पुराने साथी आजम, बेनी और किरणमय नंदा

लोकसभा चुनाव 2019-मुलायम के साथ नजर नहीं आएंगे पुराने साथी आजम, बेनी और किरणमय नंदा

Ashish Kumar Pandey | Publish: Mar, 17 2019 04:00:57 PM (IST) Lucknow, Lucknow, Uttar Pradesh, India

मुलायम सिंह चुनाव तो लड़ेंगे लेकिन अपनी ही पार्टी में अलग-थलग नजर आ रहे हैं।

 

 

लखनऊ. इस बार का लोकसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के लिए अलग ही होगा। २०१४ का लोकसभा चुनाव मुलायम सिंह के कुशल नेतृत्व में लड़ा गया था। इस बार सपा में बहुत कुछ बदल गया है। इस बार पार्टी की कमान मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव के हाथ में है और अखिलेश जो चाहेंगे वही पार्टी में होगा। चुनाव के पहले ही अखिलेश ने मुलायम सिंह को तगड़ा झटका दे दिया। मुलायम सिंह अपनी छोटी बहू के लिए संभल से टिकट चाहते थे, लेकिन अखिलेश ने उनकी एक न सुनी और अपर्णा यादव की जगह शफीकुर्र रहमान वर्क को टिकट दे दिया। इस चुनाव में मुलायम सिंह चुनाव तो लड़ेंगे लेकिन अपनी ही पार्टी में अलग-थलग नजर आ रहे हैं।

पिछले कई चुनावों से मुलायम के साथ रहे बेनी प्रसाद वर्मा, किरणमय नंदा, भगवती सिंह, रेवती रमण सिंह, आजम खां जैसे पुराने साथी इस बार नजर नहीं आ रहे हैं। वहीं मुलायम सिंह के सबसे करीब और उनके छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव अपनी पार्टी बना कर अलग ही राह चुन चुके हैं। अगर देखा जाए तो इस चुनाव में मुलायम सिंह नजर तो आएंगे लेकिन वे अपनी ही पार्टी में उस पुराने अंदाज में नजर नहीं आएंगे जो कभी आते थे।

मुलायम ने खुद तैयार की थी अपनी जमीन
सपा के ही एक पुराने नेता कहते हैं कि प्रचार और तकनीक ने राजनीति बहुत बदली है लेकिन उत्तर प्रदेश में जमीनी समीकरण साधने के फॉर्मूले पहले जैसे ही हैं। मुलायम सिंह को सियासत विरासत में नहीं मिली थी। उन्होंने खुद अपनी जमीन तैयार की थी। खुद यादवों के सबसे बड़े नेता होने के साथ ही अन्य पिछड़ी जातियों से लेकर उनके पास अगड़े-पिछड़े और मुस्लिम प्रभावी चेहरों का साथ था। मुलायम सिंह यादव अपनों के लिए तो मुलायम थे, लेकिन सियासी फैसलों में वे हमेशा सख्त रहे।

शिवपाल-संगठन को कसने में अहम भूमिका रहती थी
शिवपाल सिंह यादव की संगठन में जबदस्त पकड़ थी। संगठन को कसने में शिवपाल सिंह यादव अहम भूमिका निभाते थे। पार्टी में क्षेत्रीय क्षत्रपों की भी भरमार थी जिनका अपने-अपने क्षेत्र में दबदबा था। वहीं मुलायम के नेपथ्य में जाने के बाद उनकी टीम भी या तो पार्टी में नाम के लिए है या अपना अलग रास्ता चुन चुकी है। मसलन पार्टी के बड़े कुर्मी चेहरे बेनी प्रसाद वर्मा पार्टी में हैं तो लेकिन उनकी सक्रियता न के बराबर है। वहीं पार्टी में बड़े मुस्लिम चेहरा आजम खां ने खुद को रामपुर तक समेट लिया है।
शिवपाल यादव से लेकर अंबिका चौधरी तक पाला बदल चुके हैं। भगवती सिंह अखिलेश-शिवपाल दोनों ही खेमों में आते जाते हैं। अखिलेश यादव के आस- पास दिखने वाली टीम भी अखिलेश की ही चमक और जनाधार के भरोसे है। इक्का-दुक्का को छोड़ दिया जाए तो किसी की अपनी कोई पहचान नहीं है। इसमें से कई को तो प्रत्यक्ष चुनाव का अनुभव तक नहीं है।

कसौटी पर होंगे अखिलेश के फैसले
गठबंधन में जीत का सहज रास्ता देखने की अखिलेश यादव की इस सियासी रणनीति का भी यह सबसे बड़ा इम्तिहान है। 2017 में कांग्रेस का हाथ थामने का फैसला औंधे मुंह गिरा था। मुलायम सिंह यादव ने भी सार्वजनिक मंचों से कांग्रेस से गठबंधन पर आपत्ति जताई थी। इसलिए नतीजों ने अखिलेश के लिए मुश्किलें और बढ़ा दी। लोकसभा उपचुनाव में बीएसपी के साथ आंशिक गठबंधन की पूर्ण सफलता के बाद महागठबंधन का फैसला भी अब कसौटी पर कसा जाना है।

सीटें 37 रह जाने के बाद बाकी 43 सीटों पर दावेदारी की सपना पाले चेहरों ने दूसरी पार्टियों का रुख करना शुरू कर दिया है। पार्टी के तमाम पूर्व सांसद और विधायक शिवपाल यादव के मंच पर खड़े हो चुके हैं। ऐसे में अब सारी चुनावी रणनीति एसपी-बीएसपी के एक-दूसरे को वोट ट्रांसफर और इससे बन रहे मजबूत परसेप्शन पर टिकी है। नतीजे अनकूल रहे तो अखिलेश यूपी के साथ ही देश की सियासत में भी सिक्का जमाने की राह पर होंगे, प्रतिकूल हुए तो उत्तर प्रदेश की राह भी 2022 में मुश्किल हो जाएगी।

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