scriptOther forms of folk arts also need attention - Dravidya Vindu | उत्तर प्रदेश के लोकचित्रों को पहचान अभी तक नहीं मिली -कुमुदसिंह | Patrika News

उत्तर प्रदेश के लोकचित्रों को पहचान अभी तक नहीं मिली -कुमुदसिंह

लोककलाओंके अन्य रूपों को भी ध्यानदेने की जरूरत है -डॉविद्या विंदु सिंह

लखनऊ

Published: October 17, 2021 06:19:16 pm

लखनऊ,लोककलाएं हमारी आदिम संस्कृति की निरंतरताका प्रमाण हैं और प्रासंगिकताएक नया नारा है। प्रासंगिकता के साथ ही प्रतिबद्धता का प्रश्न भी कला और साहित्य के साथ बराबर उठाया जाता रहा है। लोक कलाएं जीवन का अंग हैं।यह जीवन को बाहर से नहीं देखतीं,बल्कि जीवन से ओतप्रोत होती हैं।आज जब जीवन से कलाओं की एकात्मकता और जुड़ाव लुप्त होता जा रहाहै तब आज के तथाकथित प्रासंगिकता के पैमाने पर लोककलाएं पूरी तरह फिट हैं यह मानना आज की अनिवार्य आवश्यकता है। लोकसंस्कृति के प्रति एक और दृष्टिचिंता का विषय है कि प्रायःकेवल नृत्य संगीत को ही लोकसंस्कृति का अंग माना जा रहाइसके अन्य रूपों पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
उत्तर प्रदेश के लोकचित्रों को पहचान अभी तक नहीं मिली -कुमुदसिंह
उत्तर प्रदेश के लोकचित्रों को पहचान अभी तक नहीं मिली -कुमुदसिंह
प्रदेश की लोकचित्रों को विशेष महत्व देने की जरूरत है। कोहबर,चौकपूरना,पीड़िया,गोदनपूजा आदि प्रदेश की लोक कलाएं हैं। जिन्हें उनके प्रतीकों के माध्यम से ही समझा जा सकता है। उन प्रतीकों को समझने के लिए उन कलाओं के नज़दीक जानाजरूरी है। हमारी लोक कलाओं में सांस्कृतिक चेतना का रसमिलता है। उक्त बातें रविवार को अस्थाना आर्ट फोरम के ओपनस्पसेस के वर्चुअल मंच परकला चर्चा में आमंत्रित कलाकारऔर मुख्य अतिथि ने रखी।अस्थाना आर्ट फ़ोरम के ऑनलाइन मंच परओपन स्पसेस आर्ट टॉक एंडस्टूडिओं विज़िट के 21वें एपिसोड का लाइव आयोजन रविवारको किया गया। इस एपिसोड मेंआमंत्रित कलाकार के रूप मेंअयोध्या उत्तर प्रदेश की लोकचित्रकार डॉ कुमुद सिंह रहीं। इनके साथ बातचीत के लिए नईदिल्ली से चित्रकार शांतनुमित्रा और इस कार्यक्रम मेंविशेष अतिथि के रूप में लखनऊसे वरिष्ठ लोक साहित्यकार डॉविद्या विन्दु सिंह विशेषअतिथि के रूप में शामिल हुईं। कार्यक्रम ज़ूम मीटिंग द्वारालाइव किया गया। कार्यक्रम के संयोजक भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने बताया कि भोजपुरीकलाओं की सक्षम हस्ताक्षर डॉकुमुद सिंह। वर्तमान मेंसंप्रति स्नातकोत्तर महाविद्यालयसाकेत अयोध्या में कला संकाय की अध्यक्ष हैं ।
वह एक सफल औरविलक्षण चित्रकार भी हैं और उनके चित्रों का मूल स्रोतलोक कलायें हैं । उनके व्यक्तित्वऔर कर्म में आज के समय में मेरी मान्यता के अनुसार भोजपुरी चित्रकला हेतु सभी आवश्यकपक्ष -कलाकार,व्याख्याताऔर प्रस्तोता या कुछ सीमा तकविश्लेषक - एकहद तक पूर्णता पाती है । आजभोजपुरी कला की पहचान और प्रसारके लिए उपरोक्त तीनों पक्षों की आवश्यकता है । डॉ कुमुदसिंह ने प्रदेश की लोकचित्रोंकी बारीकियों से लोगों को अवगतकराया। और उनमें प्रयुक्तप्रतीकों और रंगों साथ ही उनअवसरों का भी विस्तार मेंजानकारी दी साथ अन्य प्रदेशोंकी लोकचित्रों से किस प्रकारभिन्न है अपने प्रदेश की लोकचित्र इस बात पर भी जोर दिया।उन्होंने कहा की उत्तर प्रदेशकी लोक चित्रों को महत्व नहीं दिया गया जिसके कारण आज प्रदेशकी इस कला से लोग अनजान हैं हालाँकि इन कलाओं का इस्तेमालतीज त्योहारों पर करते हैंलेकिन उसके बारे में जानकारीनहीं है।
इसके लिए प्रदेश केस्थापित कला शिक्षण संस्थाएं, स्थापितकलाकार और सरकार को विशेषध्यान देने की आवश्यकता है। आज तक प्रदेश की लोकचित्रोंमें किसी कलाकार को कोई सम्मानया पुरस्कार नहीं दिया गयाअन्य प्रदेशों में लोकविधाओंमें अनेक देश के सर्वोच्चसम्मान दिए गए है। हम अपने लोकचित्रों से दूर होते जा रहेंहैं। शोध बहुत हुए हैं लेकिनउनमे स्तरीयता नहीं हैं। बसनौकरी की भावना होती है उस कलाको प्रोत्साहित करने की नहीं। जिस तरह से लोक नृत्य ,संगीतको सम्मान और पहचान मिली हैउसी प्रकार प्रदेश की लोकचित्रोंको भी मिलनी चाहिए। साहित्यमें लोकचित्रों या लोक प्रसंगोंका जिक्र ही हमारे लोक चित्रोंकी प्राचीनता को दर्शाती है।

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