Padma award 2018: पढ़ें अनवर जलालपुरी की वो शायरियां जो हिंदु-मुस्लिम को एकजुट कर देती हैं

बीती 2 जनवरी को दुनिया से अलविदा कह गए मशहूर शायर अनवर जलालपुरी को पद्मश्री पुरस्कार देने की घोषणा की गई है।

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Updated: 26 Jan 2018, 01:54 PM IST

प्रशांत श्रीवास्तव, लखनऊ. बीती 2 जनवरी को दुनिया से अलविदा कह गए मशहूर शायर अनवर जलालपुरी को पद्मश्री पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। सरकार ने मरणोपरांत अनवर जलालपुरी को पद्मश्री पुरस्कार देने की घोषणा की है। यह पुरस्कार उन्हें भगवद्गीता का उर्दू अनुवाद करने के लिए दिया गया है। उनके बेटे का कहना है उनके पिता ने पूरी जिंदगी हिन्दू-मुस्लिम एकता, भाषाई एकता और साम्प्रदायिक सौहार्द बनाए रखने की बात की और इसी के लिए काम भी करते रहे। आज उनकी कोशिशों को सरकार सम्मान दे रही है तो वह इसके लिए भारत सरकार के वह शुक्रगुजार हैं।

जानें अलवर जलालपुरी के बारे में-

प्यार को सदियों के एक लम्हे कि नफरत खा गई

एक इबादतगाह ये गन्दी सियासत खा गई...

अनवर जलालपुरी साहब ने अपनी शायरियों के जरिए हिंदु-मुस्लिम कौमों को एक मंच पर खड़ा करना पूरा प्रयास किया। उन्होंने उर्दु में गीता का पैगाम भी दिया। पिछली दो जनवरी वह दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह गए। राजधानी स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में उनका निधन हो गया। ब्रेन हैमरेज होने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।

पराया कौन है और कौन अपना सब भुला देंगे
मताए ज़िन्दगानी एक दिन हम भी लुटा देंगे

अनवर जलालपुरी उत्तर प्रदेश में आंबेडकर नगर जिले के जलालपुर कस्बे के रहने वाले थे। मुशायरों के संचालन के तौर पर वह पूरी दुनिया भर में मशहूर थे। श्रीमदभागवत गीता का उर्दू शायरी में अनुवाद करने वाले नामचीन उर्दू शायर को प्रदेश सरकार ने यश भारती सम्मान से नवाजा था। शायर अनवर जलालपुरी ने हिंदू धर्मग्रंथ श्रीमद्भगवद गीता और उर्दू भाषा के मेल का अनोखा कारनामा कर दिखाया।

मैं एक शायर हूँ मेरा रुतबा नहीं किसी भी वज़ीर जैसा
मगर मेरे फ़िक्र-ओ-फ़न का फ़ैलाव तो है बर्रे सग़ीर जैसा

अनवर की किताब 'उर्दू शायरी में गीता' का लोकार्पण मुरारी बापू और तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव ने किया था। एक इंटरव्यू में इस बारे में उन्होंने कहा था कि "मेरे दिमाग़ में 1983 के आसपास ये बात आई कि मैं गीता पर रिसर्च करूं, लेकिन जब मैंने काम शुरू किया तो यह इतना विस्तृत विषय हो गया कि मैंने सोचा कि मैं ये काम कर नहीं पाऊंगा."इसके बाद अनवर ने इसका रुख़ बदल दिया. उन्होंने बताया, "मैं चूंकि शायर हूं इसलिए मैंने सोचा कि अगर मैं पूरी गीता को शायरी बना दूं, तो यह ज़्यादा अहम काम होगा।"

कवि व शायरों ने किया याद

मशहूर शायर मुन्नवर राना ने अनवर जलालपुरी को याद करते हुए कहा कि वह उनके बड़े भाई की तरह थे। साल 1974 में उनकी पहली बार अनवर जलालपुरी से मुलाकात हुई थी। देवा शरीफ के मेले में होने वाले मुशायरे में वह अनवर जलालपुरी को सुनने गए थे। फिर उनके फैन बन गए। धीरे-धीरे दोनों के संबंध मजबूत होते गए। मुन्नवर राना ने बताया, 'एक रोज जलालपुरी साहब ने कहा कि मुझे नए घर की तलाश है तो मैंने कहा कि मुझे एक बड़े भाई की तलाश है। मेरा फ्लैट जिस बिल्डिंग में है उसमें एक घर खाली है, आप उसमें शिफ्ट हो जाएं।

उनकी खासियत ये थी कि वह अंग्रेजी के लेक्चरर थे, उर्दु में शारयी सुनाते थे और घर की जुबान हिंदी थी। तीनों भाषाओं पर उनकी मजबूत पकड़ थी।आखिरी बार उनसे तीन दिन पहले ही मुलाकात हुई थी। वह कहीं मुशायरे में जा रहे थे। वह बोले तुम भी चलो लेकिन तबीयत ठीक न होने के कारण मैंं नहीं जा पाया। उनके अचानक से दुनिया से चले जाने का बेहद अफसोस है।

सोच रहा हूँ घर आँगन में एक लगाऊँ आम का पेड़
खट्टा खट्टा, मीठा मीठा यानी तेरे नाम का पेड़

कवि सर्वेश अस्थाना ने अनवर जलालपुरी को याद करते हुए कहा कि उनका जाना कवि व शायरी प्रेमियों के लिए बड़ा झटका है। कुछ रोज पहले ही उनसे मुलाकात हुई थी। उनसे मेरा लगभग 25 साल पुराना नाता था। वह धार्मिक एकता के पैरोकार थे। जितने अच्छे मुशायरे के संचालक थे उतने ही अच्छे वक्ता भी थे। उनकी एक किताब की भूमिका भी मैंने लिखी थी। उनकी आम के पेड़ वाली शायरी मुझे सबसे ज्यादा पसंद थी।

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