मुंशीगंज गोलीकांड : जब अंग्रेज अफसर को जारी करनी पड़ी थी प्रेस विज्ञप्ति

दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन के बीच उत्तर प्रदेश के रायबरेली में हुए 100 साल पहले हुए किसानों के हित को लेकर हुए
आंदोलन में तमाम किसान शहीद हो गए थे। 7 जनवरी 1921 को हुए इस वीभत्स गोलीकांड के 100 साल पूरे हो गये हैं

By: Hariom Dwivedi

Updated: 06 Jan 2021, 05:05 PM IST

मुंशीगंज गोलीकांड पार्ट- 2

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
लखनऊ. 7 जनवरी 1921 को रायबरेली के मुंशीगंज में हुए वीभत्स हत्याकांड का दोषारोपण सरदार वीरपाल सिंह पर लगा था। इसकी जानकारी जब डिप्टी कमिश्नर मि. शेरिफ को हुई तो उन्होंने एक विज्ञप्ति प्रसारित की। जो इस प्रकार थी- 'कुछ सम्बन्धित एवं अभिरूचि रखने वाले लोगों ने यह अफवाह फैला रखी है कि सरदार वीरपाल सिंह ने गोली चलाकर किसानों की हत्या की है, यह सर्वथा असत्य और आधारहीन प्रचार है। उन्होंने अपने स्वचलित पिस्तौल से, आत्मरक्षार्थ केवल एक फायर किया है, जबकि भीड़ ने उन पर आक्रमण कर दिया था। मैंने स्वयं फायरिंग के बाद उनके पिस्तौल का निरीक्षण किया है और ऐसा करने के पश्चात मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि उन्होंने केवल एक बार ही फायर किया है क्योंकि उनके पिस्टल की मैगजीन के चेम्बर में केवल एक कारतूस खाली है, शेष चेम्बर भरा हुआ है। जनता इस आधारहीन अफवाह पर विश्वास न करे।'

उसी दिन (7जनवरी) सायंकाल लगभग 9 बजे लखनऊ डिवीजन के कमिश्नर मि. फाउंथर्प स्पेशल ट्रेन से रायबरेली पहुंचे। रायबरेली स्टेशन पर सरदार वीरपाल सिंह उनके स्वागत को मौजूद थे। उनके स्व. पिता सरदार प्रेम सिंह को कमिश्नर महोदय बखूबी जानते थे। एक समय था कि कमिश्नर मि. जे.सी. फाउंथर्प आई.सी. एस. रायबरेली के डिप्टी कमिश्नर रह चुके थे और यह लोग उनके सोसायटी के अन्तरंग सदस्य थे। 8 जनवरी से कमिश्नर महोदय ने इन्क्वायरी प्रारम्भ कर दी सरकारी और गैर सरकारी, अनेक व्यक्तियों के बयान लिये, जिनमें बाबू किस्मतराय जगधारी तथा सरदार वीरपाल सिंह के भी बयान सम्मिलित थे। जांच समाप्त करने के बाद कमिश्नर महोदय नें अपनी रिपोर्ट सरकार को प्रेषित की जिसमें डिप्टी कमिश्नर मि. शेरिफ तथा सरदार वीरपाल सिंह के पक्ष का अनुमोदन किया गया था। पुलिस द्वारा की गई फायरिंग को न्यायोचित करार दिया गया था और लेबर कोर के इंचार्ज मेजर मेगिल की शिकायत की गई थी। परिणाम स्वरूप मेजर मेगिल नौकरी से बर्खास्त कर दिये गये।

मि. मेगिल वैसे ही अंग्रेज अधिकारी थे जैसे मि. शेरिफ अथवा मि. फाउंथर्प! स्मरण रहे कि लेबर कोर ने गोलियां चलाने का दायित्व सरदार वीरपाल सिंह के मत्थे मढ़ा था। जिसका उल्लेख पं. मदन मोहन मालवीय के न्यायालय में दिये बयान में यों आया है- 'लेबर कोर के आदमी का नाम प्यारेलाल था। ...जो अपने को ग्वालवंशी बताता था। वह स्वयं आया था। उसने यह कहा था कि सरदार वीरपाल सिंह ने कई गोलियां चलाईं। मैं 16 जनवरी को लखनऊ गया था।' पं. मोतीलाल नेहरू को घटना के दिन, अर्थात 7 जनवरी 1921 को तार द्वारा रायबरेली की स्थिति की सूचना दी गई। वे मध्यरात्रि में इलाहाबाद से कार द्वारा रायबरेली पहुंचे। बाबू किस्मत राय जगधारी के मकान में रुके, जहाँ पं. जवाहर लाल नेहरू और मंगला प्रसाद पहले से ही ठहरे थे। 8 जनवरी को प्रातःकाल से ही उन्होंने ही जांच प्रारम्भ कर दी। यह जांच बाबू किस्मत राय के मकान पर ही हुई। कुछ लोगों ने इसी समय यह भी अफवाह फैला दी कि लेबर कोर के सुबेदार हाकिम सिंह ने पं. मोतीलाल नेहरू के सामने स्वीकार कर लिया है कि पहली गोली मैंने चलाई है। बाद में तुरन्त इसका खंडन किया गया। 8 जनवरी की शाम को जांच पड़ताल करके पं. मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल के साथ कार द्वारा इलाहाबाद लौट गये।

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