scriptRevealed in research in Rajasthan and Gujarat forests were flourishing | Research Revealed: राजस्थान और गुजरात में कभी लहलहाते थे जंगल, केंद्रीय संस्थान की रिसर्च में खुलासा | Patrika News

Research Revealed: राजस्थान और गुजरात में कभी लहलहाते थे जंगल, केंद्रीय संस्थान की रिसर्च में खुलासा

रिसर्चरों ने 5.5 करोड़ वर्ष पुराना एक जीवाश्मीकृत पराग खोज निकाला है। राजस्थान और गुजरात जैसे भारत के पश्चिमी हिस्सों से प्राप्त इस 5.5 करोड़ वर्ष पुराने जीवाश्मीकृत पराग की पड़ताल से पता चला कि इस वृक्ष की प्रजातियों की संतति अफ्रीका में 10.2 करोड़ वर्ष पूर्व आरंभ हुई थी। यह वह काल था जब डायनासोर भी जीवित थे।

लखनऊ

Published: February 18, 2022 06:30:50 pm

Research Revealed: आज जहाँ राजस्थान और गुजरात स्थित हैं उस इलाके में आज से करोड़ों वर्ष पहले कभी 'साल' वृक्ष के घने जंगल हुआ करते थे। ये खुलासा किया है प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (बीएसआइपी) के शोधार्थियों ने। संस्थान के रिसर्चरों ने 'साल' वृक्ष की उत्पत्ति और विकास को लेकर की गयी एक रिसर्च को पेश किया है, जिसमें इस बात का उल्लेख है। बीएसआइपी की निदेशक प्रो. वंदना प्रसाद, उनकी रिसर्च स्कालर माही बंसल, यूके के पेलिनोवा से प्रो. रोबर्ट जे मोरले, आइआइटी मुंबई से प्रो. सूर्येन्दु दत्ता और द नेचर कंजर्वेन्सी (टीएनसी) दिल्ली से डा. शिव प्रकाश समेत देश-विदेश के दर्जनों शोधार्थियों की निरंतर मेहनत के परिणाम से साल वृक्ष से जुड़ी गुत्थी सुलझ पाई है।
Research Revealed: राजस्थान और गुजरात में कभी लहलहाते थे जंगल, केंद्रीय संस्थान की रिसर्च में खुलासा
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रिसर्चरों ने 5.5 करोड़ वर्ष पुराना एक जीवाश्मीकृत पराग खोज निकाला है। जिसमें पुष्टि हुई कि शोरिया रोबस्टा विज्ञानी नाम वाले साल वृक्ष की प्रजाति सबसे पहले अफ्रीका में ही पनपी थी। राजस्थान और गुजरात जैसे भारत के पश्चिमी हिस्सों से प्राप्त इस 5.5 करोड़ वर्ष पुराने जीवाश्मीकृत पराग की पड़ताल से पता चला कि इस वृक्ष की प्रजातियों की संतति अफ्रीका में 10.2 करोड़ वर्ष पूर्व आरंभ हुई थी। यह वह काल था जब डायनासोर भी जीवित थे।
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इस रिसर्च को लेकर संस्थान की प्रो. वंदना प्रसाद कहा कहना है कि, 'हमारे संस्थान में इवोल्यूशन (उत्पत्ति) से लेकर जलवायु परिवर्तन तक के कई पहलुओं पर शोध किया जाता है। साल वृक्ष पर हुआ यह शोध न केवल इस पहलू को पुष्ट करता है कि अरबों वर्ष पहले भी भारत और अफ्रीका में तमाम पादप समानताएं थीं, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन को समझने में भी महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।' उन्होंने बताया कि बीएसआइपी का यह शोध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित जर्नल 'साइंस' में भी प्रकाशित हुआ है।
पारिस्थितिकी तन्त्र के लिए अहम है साल का वृक्ष

रिसर्चर माही बंसल के मुताबिक, 'आखिर यह कल्पना किसने की होगी कि विशेष रूप से भारत में पाए जाने वाले साल वृक्ष की उत्पत्ति समंदर पार अफ्रीका में हुई होगी।' उन्होंने बताया कि साल वृक्ष परिवार का अपना आर्थिक और चिकित्सीय महत्व है। वर्तमान में दक्षिण पूर्व एशियाई वर्षा वनों में साल के वृक्षों की बहुतायत है, जो हाथियों, गैंडों और वनमानुषों की विलुप्त होती प्रजातियों को आश्रय एवं भोजन प्रदान करते हैं।
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गुजरात और राजस्थान में खोजा 5.5 करोड़ वर्ष पुराना पराग

शोधार्थियों ने गुजरात और राजस्थान से जहां 5.5 करोड़ वर्ष पुराना जीवाश्मीकृत पराग खोजा तो उन्हें उत्तरी अफ्रीका से 6.85 करोड़ वर्ष पुराना साल परिवार से संबंधित पराग मिला। फिर इस साक्ष्य का जीवाश्म राल और आनुवंशिक डीएनए से मेल कराकर साल की उत्पत्ति और विकास का पता लगाया गया। रिसर्चरों के मुताबिक अफ्रीका में जब 'साल' संतति उभार ले रही थी, तब भारत, गोलार्ध के दक्षिणी हिस्से में मकर रेखा के निकट स्थित था, जहां साल के विकास के लिए अनुकूल जलवायु परिवेश नहीं था।

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