होली दहन के समय करें, यह काम खुल जाएगी क़िस्मत 

होली दहन के समय करें, यह काम खुल जाएगी क़िस्मत 
Holi 2017

Ritesh Singh | Publish: Mar, 12 2017 04:49:00 PM (IST) Lucknow, Uttar Pradesh, India

प्रचलित मान्यता के अनुसार, कितना असर डालता हैं जीवन पर 

लखनऊ , पंडित शक्ति मिश्रा ने बतायाकि होली के अवसर पर इस वर्ष फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा  रात्रि 07:26 तक है , सूर्यास्त का समय सायं 05:52 बजे है और मृत्युबाण रात्रि 07:47 से आरम्भ हो रहा है इसलिए होलिका दहन ( सूर्यास्त के बाद और पूर्णमासी के मध्य में,  प्रतिपदा या मृत्यबाण लगने से पूर्व )शाम 05:52 बजे से 07:26 बजे के मध्य करना चाहिए । होली केवल रंग अबीर गुलाल मौज मस्ती करने का दिन ही नहीं अपितु आध्यात्मिक् उन्नति और पुण्य अर्जन हेतु जप तप का दिन होता है।

प्रचलित मान्यता के अनुसार 

यह त्यौहार हिरण्यकशिपु की बहन होलिका के मारे जाने की स्मृति में मनाया जाता है। पुराणों में वर्णित है कि हिरण्यकशिपु की बहन होलिका वरदान के प्रभाव से नित्य अग्नि स्नान करती और जलती नहीं थी। हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका से प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि स्नान करने को कहा। उसने समझा कि ऐसा करने से प्रह्लाद अग्नि में जल जाएगा तथा होलिका बच जाएगी। होलिका ने ऐसा ही किया, किंतु होलिका जल गयी, प्रह्लाद बच गये। होलिका को यह स्मरण ही नहीं रहा कि अग्नि स्नान वह अकेले ही कर सकती है। तभी से इस त्योहार के मनाने की प्रथा चल पड़ी।

यह बहुत प्राचीन उत्सव है। इसका आरम्भिक शब्दरूप होलाकाथा। भारत में पूर्वी भागों में यह शब्द प्रचलित था। जैमिनि एवंशबर का कथन है कि 'होलाका' सभी आर्यो द्वारा सम्पादित होना चाहिए। काठकगृह्य में एक सूत्र है 'राका होला के', जिसकी व्याख्या टीकाकार देवपाल ने यों की है- 'होला एक कर्म-विशेष है जो स्त्रियों के सौभाग्य के लिए सम्पादित होता है, उस कृत्य में राका देवता है।' अन्य टीकाकारों ने इसकी व्याख्या अन्य रूपों में की है। 'होलाका' उन बीस क्रीड़ाओं में एक है जो सम्पूर्ण  भारत  में प्रचलित हैं। इसका उल्लेख  वात्स्यायन के कामसूत्र में भी हुआ है जिसका अर्थ टीकाकार जयमंगल ने किया है। फाल्गुन की पूर्णिमा पर लोग श्रृंग से एक-दूसरे पर रंगीन जल छोड़ते हैं और सुगंधित चूर्ण बिखेरते हैं। हेमाद्रि ने बृहद्यम का एक श्लोक उद्भृत किया है। जिसमें होलिका-पूर्णिमा को हुताशनी कहा गया है। लिंग पुराण में आया है- 'फाल्गुन पूर्णिमा को 'फाल्गुनिका' कहा जाता है, यह बाल-क्रीड़ाओं से पूर्ण है और लोगों को विभूति, ऐश्वर्य देने वाली है।' वराह पुराण में आया है कि यह 'पटवास-विलासिनी' है। 

जैमिनि एवं काठकगृह्य में वर्णित होने के कारण यह कहा जा सकता है कि ईसा की कई शताब्दियों पूर्व से 'होलाका' का उत्सव प्रचलित था। कामसूत्र एवं भविष्योत्तर पुराण इसे वसन्त से संयुक्त करते हैं, अत: यह उत्सव पूर्णिमान्त गणना के अनुसार वर्ष के अन्त में होता था। अत: होलिका हेमन्त या पतझड़ के अन्त की सूचक है और वसन्त की कामप्रेममय लीलाओं की द्योतक है। मस्ती भरे
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