यूपी चुनाव : त्रिकोणीय मुकाबले में फंसी हैं कई सीटें

गठबंधन होने के बाद सत्ताधारी सपा की हुयी दावेदारी में वापसी  

By: Mahendra Pratap

Published: 01 Feb 2017, 05:57 PM IST

लखनऊ। कहते हैं देश की राजनीति का रास्ता उप्र से होकर ही निकलता है। देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश इस समय सूबे की १७ वीं विधानसभा के लिए चुनाव के दौर से गुजर रहा है। सत्तारुढ़ समाजवादी पार्टी में वर्चस्व की जंग ने पिछले छह महीने से देश का ध्यान अपनी तरफ खींच रखा है। पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव और सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बीच रूठने और मनाने का दौर जारी है। छह माह पहले तक समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश की सत्ता में फिर से वापसी की प्रबल दावेदार मानी जा रही थी। लेकिन वर्चस्व की लड़ाई में सपा को काफी नुकसान हुआ है। स्थिति यहां तक जा पहुंची कि पहले अकेले चुनाव लडऩे की बात करने वाली सपा को अब कांग्रेस से गठबंधन करना पड़ा है। इस तरह से सत्रहवीं विधानसभा के चुनाव के लिए पूरे प्रदेश में इस बार तमाम सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है। 
हाथी की मस्त चाल 
बहुजन समाज पार्टी प्रदेश की सभी ४०३ विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ रही है। पार्टी की सुप्रीमो मायावती अपने चुनाव चिन्ह हाथी के साथ अकेले पूरे प्रदेश में चुनाव प्रचार कर रही हैं। वह खुद अपनी पार्टी की स्टार प्रचारक भी हैं। बसपा ने इस बार चुनाव में बहुजन और सर्वजन के हित को ध्यान में रखते हुए टिकट बांटे हैं। बसपा मुस्लिम, दलित और सवर्णों के गठजोड़ के बूते सत्ता में वापसी के ख्वाब देख रही है। पार्टी से इस बार सबसे ज्यादा ९९ मुस्लिम प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है। इसका उसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत अन्य मुस्लिम बहुल सीटों पर फायदा होते दिख रहा है। 
बागियों से कैसे निपटे सपा
प्रदेश में मुसलमानों की आबादी करीब १९.३ प्रतिशत है। मुसलमानों की पहली पसंद अब तक समाजवादी पार्टी रही है। लेकिन इस बार पिता-पुत्र की लड़ाई की वजह से मुसलमान असमंजस में हैं। मायावती इसी का फायदा उठाना चाह रही हैं। लेकिन समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन किया है। समझौते के तहत कांग्रेस को १०५ सीटें सपा ने दी हैं। सपा-कांग्रेस गठबंधन की वजह से प्रदेश में मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। सपा के परंपरागत वोटर यादव,मुस्लिम और अन्य पिछड़ा वर्ग की अन्य जातियां हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का विश्वास है कि कांग्रेस और सपा के मतों को मिलाकर उनकी सत्ता में दोबारा वापसी हो सकती है। लेकिन सपा ने ६६ से अधिक अपने वर्तमान विधायकों के टिकट काट दिए हैं। इनमें कुछ मंत्री भी शामिल हैं। ये सब के सब बागी हो गए हैं। कुछ राष्ट्रीय लोकदल के साथ हो लिए हैं तो कुछ अन्य दलों के साथ। बड़ी संख्या में निर्दलीय भी मैदान में हैं। ये सब के सब सपा का ही वोट काट रहे हैं। ऐसे में सपा-कांग्रेस गठबंधन के समक्ष बड़ी चुनौती है।
भाजपा जूझ रही भितरघात से
भारतीय जनता पार्टी के लिए उप्र का चुनाव करो या मरो की स्थिति में है। करीब दो दशक से सत्ता से दूर पार्टी के लिए यह चुनाव चुनौती भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की प्रतिष्ठा भी इस चुनाव से जुड़ी हुई है। पार्टी ने ४०३ सीटों पर उम्मीदवारों को उतारा है लेकिन कुछ सीटों पर उसके गठबंधन के सहयोगी चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा ने १२ सीटें अपना दल के लिए, एक सीट राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी के लिए और दो सीटें पूर्वांचल के दल सुहेलदेव दल के लिए छोड़ रखी है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या, केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, उमा भारती और कलराज मिश्र पार्टी के चेहरे हैं। लेकिन भाजपा ने प्रदेश में मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया है। इसका उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसके अलावा पार्टी अपने ही दल के उम्मीदवारों की भितरघात की शिकार हो गयी है। उसे कई सीटों पर पार्टी के विरोधियों का सामना करना पड़ रहा है।
अभी तस्वीर स्पष्ट नहीं
प्रदेश में सात चरणों में चुनाव हो रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहले चरण का चुनाव होना है जबकि सातवें और अंतिम चरण का चुनाव पूर्वांचल के जिलों की विधानसभाओं में होगें। कुल मिलाकर अभी तक कौन सी पार्टी सरकार बनाएगी इसकी तस्वीर स्पष्ट नहीं हो पायी है। हाल ही में आए चुनाव सर्वे भी दिग्भ्रमित करने वाले हैं। कुछ में सपा कांग्रेस गठबंधन को आगे दिखाया गया है तो कुछ में भाजपा को। लेकिन, बसपा को कम आंकना भूल होगी। उसके कैडर के वोटर चुप हैं। यही हाल अन्य मतदाताओं का है। वोटरों की खामोशी से कुछ नया ही निकलने वाला है इस बार उप्र में। 

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