Lucknow literature carnival: पहले दिन खाली पड़ी रहीं कुर्सियां, INTOLERNACE का मुद्दा रहा चर्चा में

लखनऊ लिट्रेचर कार्निवल के पहले दिन कम दिखे दर्शक

लखनऊ. नवाबों के शहर में क्या साहित्य प्रेमियों की कमी हो गई है? क्या हम सहित्य से दूर जा रहे हैं? साहित्यकारों पर सवाल-जवाब का दौर पिछले दिनों खूब चला लेकिन इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में शुरु हुए साहित्य के इस मेले में पड़ी खाली कुर्सियों को देखकर तो ऐसा लगा कि जैसे मानों हम साहित्य से दूर होते जा रहे हैं। लखनऊ के मशहूर लेखक अमृतलाल नागर को डेडिकेटिड इस लिट्रेचर कार्निवल के पहले दिन कार्निवल का नजारा कुछ फीका सा रहा। पहले दिन आए लेखकों ने अमृतलाल नागर, इस्मत चुगटाई, कृष्ण चंदर, राजेंदर सिंह बेदी और मंटो को याद किया और उनसे जुड़े तमाम किस्से शेयर किए। इस मौके पर मशहूर लिरिसिस्ट कौसर मुनीर और स्वनंद किरकिरे ने गीतों से संबंधित कार्यक्रम भी पेश किया है।

चर्चा के बीच आया INTOLERNACE


कार्निवल के पहले दिन तमाम मुद्दों पर चर्चा हुई। अतुल तिवारी, अचला नागर, नूर जहीर, प्रीति गुप्ता ने अमृतलाल नागर से जुड़े तमाम किस्से शेयर किए और उनकी लेखनी के अंदाज को लेकर चर्चा की। वहीं इसमत चुगताई, कृष्ण चंदर, राजेंदर सिंह बेदी पर हुई चर्चा में नूर जहीर और सलीम आरिफ ने हिस्सा लिया। इस दौरान दर्शकों की ओर से सवाल हुआ कि क्या पहले जमाने में लेखक ज्यादा आजाद थे आज के मुकाबले? क्या पहले उनकी लेखनी पर इतने सवाल नहीं उठते। इसके जवाब में सलीम आरिफ बोले कि ऐसा बिलकुल नहीं है। पहले जमाने में भी लेखकों का विरोध हुआ है। कई लेखकों ने देश तक छोड़ा है। बात अब यह है कि जब भी कोई कहता है कि इनटॉलरेंस बढ़ रहा है तो जवाब आता है कि देश इंटॉलरेंट नहीं है। जबकि कहने वाले का केवल इतना कहने वाला देश पर सवाल नहीं खड़ा करता है। वे तो बढ़ती असहनशीलता पर बोलता है जिस पर भी उसे विरोध झेलना पड़ता है।



आम दर्शकों के बीच तक पहुंचने की जरूरत

कार्निवाल में मौजूद लेखक रुद्र प्रताप दुबे का कहना था कि प्रोग्राम के पहले दिन भीड़ कम होने का कारण कहीं न आयोजकों तक आम लोगों से कनेक्ट की कमी है। आम दर्शक इस शहर के लिट्रेचर में इंट्रेस्ट तो रखते हैं लेकिन यह दिलचस्पी अगर भीड़ में नहीं बदलती तो वाकई चिंता का विषय है। एक चीज और देखने को मिली है कि जो युवा वहां मौजूद थे उनमें केवल टॉम अलटर, कौसर मुनीर जैसे चर्चित चेहरों के बारे में चर्चा हो रही थी यानि युवा साहित्य के प्रति उतने जागरूक नहीं दिख रहे थे। वहीं पत्रकार हिमांशु बाजपेयी ने भी कार्निवल में कुर्सियां खाली होने पर चिंत व्यक्त की है। उनका कहना था कि लोगों का लिट्रेचर के कार्यक्रमों से जुड़ाव कम होना वाकई चिंता का विषय है। आयोजकों को इस पर विचार करना चाहिए।
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