यूपी की सियासत में 24 बरस पुरानी कहानी फिर दोहराई

यूपी की सियासत में 24 बरस पुरानी कहानी फिर दोहराई

Alok Pandey | Publish: Mar, 14 2018 04:34:34 PM (IST) Lucknow, Uttar Pradesh, India

उत्तर प्रदेश में उपचुनाव के नतीजे किसी नए जातीय गठबंधन की बानगी नहीं, बल्कि निषाद-पटेल-यादव और मुस्लिमों की जुगलबंदी से हारी भाजपा

आलोक पाण्डेय

लखनऊ. उत्तर प्रदेश में उपचुनाव के नतीजे किसी नए जातीय गठबंधन की बानगी नहीं, बल्कि यूपी की सियासत की 25 बरस पुरानी कहानी है, जोकि दोहराई गई है। वर्ष 1991 से राममंदिर आंदोलन से उपजे सांप्रदायिक समीकरणों को मुलायम सिंह और कांशीराम की जोड़ी ने वर्ष 1993 में हाथिये पर धकेल दिया था। उस वक्त सपा-बसपा के गठबंधन ने रामलहर के बावजूद भाजपा से सत्ता से दूर कर दिया था। गोरखपुर और फूलपुर के चुनावों के नतीजों को देखा जाए तो कोई चमत्कार नहीं हुआ है, बल्कि विपक्ष की जातीय गोलबंदी का करिश्मा और मोदी मैजिक के कमजोर पडऩे का नतीजा है।


मोदी मैजिक में संयुक्त विपक्ष से डेढ़ लाख वोट ज्यादा मिले थे

हालिया नतीजों की पिछले चुनावों से तुलना करने पर स्पष्ट है कि मोदी मैजिक की आंधी में विपक्षी दलों का सूपड़ा साफ हो गया था। उस दौर में गोरखपुर में भाजपा ने 51.80 फीसदी बटोरकर निकटतम प्रत्याशी से करीब तीन लाख मतों के अंतर से विजयी पताका लहराई थी, लेकिन सपा प्रत्याशी राममती निषाद और बसपा के रामभुुआल निषाद को मिले वोटों क्रमश: 226344 तथा 176412 को जोड़ दिया जाए तो यह अंतर सिर्फ एक लाख छत्तीस हजार वोटों का बचता है। गोरखपुर में कुल बीस लाख मतदाताओं में निषाद मतदाताओं की संख्या सर्वाधिक करीब चार लाख है। गोरखपुर में वर्ष 1989 से 2014 के आठ चुनावों के नतीजों का विश्लेषण करें तो स्पष्ट है कि सिर्फ दो बार, 1998 और 1999 में योगी आदित्यनाथ को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। योगी आदित्यनाथ वर्ष 1998 का चुनाव 26,206 और 1999 का चुनाव सिर्फ 7,339 वोटों से जीते थे। दोनों बार समाजवादी पार्टी प्रत्याशी जमुना निषाद से उन्हें कड़ी टक्कर मिली थी। उक्त दोनों चुनावों में बीएसपी प्रत्याशी को क्रमश: 15.23 और 13.54 फीसदी वोट लिया। ऐसे में यदि सपा-बसपा का संयुक्त प्रत्याशी सामने होता तो गोरखपुर का इतिहास काफी पहले बदल चुका होता। इसी प्रकार फूलपुर में पिछला चुनाव केशवप्रसाद मौर्य भी तीन लाख के अंतर से जीते थे, लेकिन फूलपुर में सपा-बसपा प्रत्याशियों के मतों को जोड़ दिया जाए तो यह अंतर 144598 का बचता है। उस दौर में फूलपुर के पटेलों ने एकमुश्त भाजपा का समर्थन किया था, लेकिन इस मर्तबा पटेलों के वोट विभाजित हो गए, जबकि यादव और मुस्लिमों ने सपा का इकतरफा समर्थन किया है।


निषाद-पटेल-यादव और मुस्लिमों की जुगलबंदी से हारी भाजपा

उपचुनाव के नतीजे बताते हैं कि गोरखपुर और फूलपुर में निषाद, पटेल, यादव और मुस्लिम मतदाताओं की जुगलबंदी में दलित वोटरों से समर्थन ने भाजपा का विजय रथ रोक दिया। फूलपुर लोकसभा क्षेत्र के पांचों विधानसभा क्षेत्रों की बात करें तो पिछले विधानसभा चुनाव में फाफामऊ, सोरांव, फूलपुर, इलाहाबाद पश्चिम और इलाहाबाद उत्तर विधानसभा क्षेत्र में सपा को 28 प्रतिशत और बहुजन समाजवादी पार्टी को 22 प्रतिशत वोट मिले थे। गठबंधन की स्थिति में दोनों दलों को प्राप्त वोटों का प्रतिशत 50 प्रतिशत होता है। इसके अतिरिक्त मौजूदा समय में मोदी मैजिक कमजोर हुआ है, प्रदेश सरकार के प्रति भी मतदाताओं में नाराजगी है। ऐसी स्थिति में बीजेपी को उपचुनाव में झटका लगना मुमकिन था।


1993 में गले मिले थे मुलायम सिंह और कांशीराम

इतिहास के झरोखे में झांककर देखें तो उपचुनाव के नतीजे 25 साल पुरानी कहानी का नया वर्जन लगते हैं। वर्ष 1993 में रामलहर पर सवार भाजपा विधानसभा चुनावों में जीत के प्रति आशान्वित थी। इसी दौर में सांप्रदायिक धुव्रीकरण से घबराए सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बसपा प्रमुख कांशीराम के सामने गठबंधन का प्रस्ताव रखा। सत्ता की साझेदारी की बात पक्की होने के बाद विधानसभा चुनावों में सपा-बसपा गठबंधन चुनाव मैदान में उतरा था। उस दौर में नारा दिया गया था मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम। और वाकई विधानसभा चुनावों के नतीजों ने भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया था। भाजपा को सर्वाधिक १७७ सीटें मिली थीं, जबकि गठबंधन को 176 सीटें हासिल हुई थी। गठबंधन ने जनता दल, कांग्रेस और वामपंथियों के सहयोग से प्रदेश में सरकार का गठन किया था।

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