इन कारणों से अब गौरेया हमारे आंगन में नहीं चहचहाती

रविवार को गौरेया दिवस है, जिसके चलते पूरे शहर में विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी गौरेया को बचाने के लिए कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा।

लखनऊ. रविवार काे गौरेया दिवस है, जिसके चलते पूरे शहर में विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी गौरेया को बचाने के लिए कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा, लेकिन शायद ही गौरेया को बचाने व गौरेया की विलुप्ति की कगार पहुंचाने वाले कारणों को खत्म करने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाए।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि गौरेया एक ऐसा पंछी है जो जंगलों व दूर दराज के इलाकों की अपेक्षा इंसानों की बस्तियों में रहना अधिक पसंद करता है और इन्सानी घर के झरोखों में भी घोंसले बना लेती थी। इसके चलते गौरेया को अंग्रेजी में हाउस स्पैरो भी कहा जाता है।

इन बदलाव के चलते गौरेया हो रही विलुप्त
-जैसा की हम पहले ही बता चुके हैं कि गोरेया घरों के झरोखों में घोसला बना के रहती थी, लेकिन बदलते आधुनिक युग में अब घरों में झरोखे ही नहीं हैं तो गौरेया घोंसला कहां बनाए। अब आधुनिक घरों का निर्माण इस तरह किया जा रहा है कि उनमें पुराने घरों की तरह छज्जों, टाइलों और कोने के लिए जगह ही नहीं है। जबकि यही स्थान गौरेया के घोंसलों के लिए सबसे उपयुक्त होते हैं।

-खेतों में कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल कर गौरेया का कुदरती भोजन भी खत्म कर दिया जबकि गौरेया हानिकारक कीड़ों-मकोड़ों को खाकर फसल की रक्षा ही करती थी। गौरेया का भोजन अनाज के दाने और मुलायम कीड़े हैं। गौरेया के चूजे तो केवल कीड़ों के लार्वा खाकर ही जीते हैं। कीटनाशकों से कीडो़ं के लार्वा मर जाते हैं। ऐसे में चूजों के लिए तो भोजन ही खत्म हो गया है। फिर कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से गौरेया कहां से आएगी।

-गौरेया इन्सानों के घरों में घोसला बनाने के साथ साथ पेड़ों पर अपने घोंसले बनाती है। पर अब तो वृक्षों की अंधाधुंध कटाई के चलते पेड़-पौधे लगातार कम होते जा रहे है।

-पेट्रोल के दहन से निकलने वाला मेथिल नाइट्रेट छोटे कीड़ों के लिए विनाशकारी होता है, जबकि यही कीट गौरया के चूजों के खाद्य पदार्थ होते हैं। जो पेट्रोल के दहन के चलते गौरेया के बच्चों को भोजन नहीं मिल पाता है।

-मोबाइल टावर की तरंगें भी गौरेया को प्रभावित करती हैं। गौरेया के अंडे से जिन बच्चें को निकलने में दस से बारह दिन लगते हैं, मोबाइल टावर से निकलने वाले रेडिएशन से अंडों के भीतर बच्चों का विकास रूक जाता है और गौरेया के बच्चे अंडों से महीने भर बाद भी नहीं निकल पाते।

इन तमाम कारणों के चलते गैरेया जी विलुप्ति की कगार पर हैं। यदि गौरेया को विलुप्त होने से बचाना है तो इन तमाम चीजों को रोकना होगा।
Prashant Mishra
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