#NationalYouthDay: लीक से हटकर, वो निकले हैं नई राह की तलाश में.....

पीएम मोदी के #skilldevelopment मिशन को यूपी के यह युवा बढ़ावा देने का पूरा प्रयास कर रहे हैं

प्रशांत श्रीवास्तव, लखनऊ. स्वामी विवेकानंद कहते थे कि उठो जागो और तब तक न रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए। ऐस ही लक्ष्य को साकार करने के लिए, नई राह की तलाश में और कुछ अलग करने के प्रयास में वे निकले हुए हैं। मंजिल मिलेगी या नहीं ये तो नहीं पता लेकिन आने वाला टाइम में उनके प्रयासों को जरूर सराहा जाएगा। इन दिनों स्किल इंडिया को लेकर चर्चा हर ओर है। पीएम मोदी भी देश को विकास की प्रगति पर ले जाने को लेकर अग्रसर हैं। इसी प्रयास में यूपी के कई युवा भी हैं जो कुछ हटकर करने के प्रयास में लगे हैं।

सेव इंडियन ग्रेन से किसानों की मदद का प्रयास कर रहे अनुराग

प्रधानमंत्री के डिजिटल इंडिया कैंपेन को शहर के अनुराग एक नया रंग दे रहे हैं। यूएस से वापस लौटे लखनऊ के महानगर में रहने वाले अनुराग ने पीएम की मुहिम से किसानों को जोड़ने के लिए ‘सेव इंडियन ग्रेन’ नाम से एक वेबसाइट क्रिएट की है, जहां वे क्लस्टर्स मैप की मदद से किसानों को फायदे-नुकसान से रू-ब-रू करा रहे हैं, ताकि अन्नदाता को एम्पावर किया जा सके। अनुराग का मानना है कि एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट में क्लस्टर मैप अब तक का सबसे यूनीक आइडिया है। साथ ही अनुराग ने फसल कटने के बाद होने वाले नुकसान को कम करने के लिए किसानों को किराए पर स्टोरेज प्रोवाइड करने की प्लानिंग भी की है।

US से अकाउंट्स में मास्टर्स की डिग्री हासिल करने के बाद अनुराग ने वाशिंगटन डीसी में ग्लोबल नॉन फॉर प्रॉफिट ऑर्गनाइजेशन में छह साल तक काम किया। अनुराग बताते हैं कि वहां मैंने नोटिस किया कि कई वेबसाइट्स पर क्लस्टर मैप की मदद से डिजास्टर मैनेजमेंट किया जाता है और विक्टिम्स एरिया में मदद पहुंचाई जाती है। मुझे यह आइडिया काफी क्रिएटिव लगा और इस पर मैं अपने देश के लिए कुछ करना चाहता था। वापस आकर मैंने पाया कि जहां एग्रीकल्चर सेक्टर देश की जीडीपी में 20 परसेंट कंट्रीब्यूट करता है, उसमें अब भी कई तरह की समस्याएं हैं। इसी को देखते हुए मैंने क्लस्टर मैप वाले आइडिया को एग्रीकल्चर फील्ड में उतारने की कोशिश की। इसकी मदद से किसानों के साथ पॉलिसी मेकर, आढ़त और मंडी के लोगों को मदद मिलेगी। इससे वे पता कर पाएंगे कि किस जगह किस फसल की पैदावार ज्यादा है। किस जगह फसल बेचने पर मुनाफा ज्यादा होगा। फसल के लिए स्टोरेज कहां अवेलबल है, कितना अवेलबल है।
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किसानों का मिलेगा फायदा


किसान बड़ी उम्मीद के साथ अपनी फसल तैयार करता है और उसे मंडी में बेचता है लेकिन इसके बावजूद ऐसी कई चीजें हैं, जिसके बारे में वे पूरी तरह से अवेयर नहीं हैं। अनुराग के मुताबिक, ‘क्लस्टर मैप के जरिए फसल पैदा करने के लिए किन-किन चीजों की जरूरत पड़ती है और वे कहां पर अच्छी और वाजिब दाम में मिल रही हैं, इसके बारे में पता कर सकते हैं। जैसे फसल के लिए बीज कहां अच्छी क्वालिटी में मिलेगा, कौन सी खाद किस फसल के लिए बेस्ट रहेगी और उसके दाम कितने हैं, ये सब उन्हें मैप से पता चलेगा। फसल तैयार होने के बाद उसके आगे के प्रोसीजर के बारे में भी पता कर सकेंगे। जैसे जिस गेहूं को किसान जितने दाम में मंडी में बेच रहे हैं, मार्केट में उसके बने आटे की कितनी कीमत है। हमने क्लस्टर मैप में आंकड़ों के साथ ऑर्गनाइजेशन का नाम, उसकी मेल आईडी, एड्रेस और फोन नंबर भी दिए हैं।
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चिकनकारी को चमन करने की मोहित की कोशिश


चिकनकारी के लिए लखनऊ दुनियाभर में मशहूर है लेकिन इस कला के कारीगरों की हालत किसी से छिपी नहीं है। कड़ी मेहनत के बावजूद उनकी इनकम न के बराबर है। उधर कई लोग ऐसे भी हैं, जो इनकी जिंदगी में रोशनी लाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हीं में से एक हैं लालकुआं निवासी मोहित वर्मा। मुंबई के टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज से पढ़ाई करने के बाद मोहित ने प्राइवेट जॉब करने की बजाय अपने शहर लौटकर चिकनकारी के वर्कर्स को बढ़ावा देने के लिए थ्रेड क्राफ्ट ऑफ इंडिया ऑर्गनाइजेशन की शुरुआत की। इससे अब करीब 40 महिलाएं जुड़ी चुकी हैं, जिनके चिकनकारी के काम को मोहित दिल्ली, मुंबई समेत कुछ बड़े शहरों में एक्सपोर्ट करते हैं। उससे जो भी प्रॉफिट होता है, वे संस्थान समेत इन वर्कर्स में बांट दिया जाता है।

आईबीएम की नौकरी छोड़कर किया था कोर्स


लखनऊ में पले बढ़े मोहित ने ग्रैजुएशन करने के बाद सिटी बैंक और आईबीएम जैसी बड़ी कंपनियों में काम किया। मोहित की पोस्टिंग गुड़गांव में थी। जॉब के दौरान मोहित का मन कुछ अलग हटकर करने का था। वे सोशल इश्यूज को लेकर काफी अवेयर रहते थे। मोहित कहते हैं, एक रोज मुझे अहसास हुआ कि ये वो नहीं जो मैं करना चाहता हूं। फिर मैंने सोशल साइंस से जुड़े इंस्टिट्यूट्स के बारे में पता किया और एक दिन डिसाइ़ड किया कि आगे की जॉब छोड़कर आगे की पढ़ाई करने मुंबई जाऊंगा। वे गुड़गांव से मुंबई चले गए, जहां उन्होंने टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में एडमिशन लिया। इस कॉलेज से उन्होंने सोशल आंत्रप्रेन्योरशिप में स्पेशलाइजेशन किया । वे कोर्स के दौरान चिकनकारी पर रिसर्च करने लखनऊ आए। यहां उन्होंने देखा कि आरी, जरदोजी समेत जितने भी एंब्रॉयड्री के काम हैं, उनमें चिकन की कारीगारी करने वाली महिलाओं की आर्थिक स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। मोहित बताते हैं, मैं 2012 में लखनऊ आया तो मेरी मुलाकात जरीना खातून से हुई, जो कि अब हमारी संस्था की सुपरवाइजर हैं। उस वक्त उन्होंने मेरी कई कारीगरों से मुलाकात कराई। मुझे उनकी स्थिति देखकर अंदाजा हो गया था कि इस सेक्टर में काफी सुधार की गुंजाइश है। फिर मुंबई लौटकर मैंने चिकनकारी पर अपनी रिसर्च जारी रखी। फाइनल ईयर में मैंने कैंपस प्लेसमेंट में हिस्सा लेने के बजाय अपना खुद का काम शुरू करने का मन बनाया।
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सिंगापुर के बैंक ने की मदद


कोई भी संस्था खोलने में सबसे पहली जरूरत फंड जुटाने की होती है। मोहित के सामने भी यह एक बड़ा चैलेंज था लेकिन डिवलेपमेंट बैंक ऑफ सिंगापुर ने उनकी मदद की। मोहित के मुताबिक, ‘हमारे कॉलेज का डिवलेपमेंट बैंक ऑफ सिंगापुर से एमओयू साइन हुआ था। इसके तहत कॉलेज से पासआउट स्टूडेंट अगर अपना सोशल इंटरप्राइज से जुड़ा कोई ऑर्गनाइजेशन खोलेगा तो शुरुआत में बैंक उसे फंड देगी। इसी एमओयू के तहत हमें शुरुआत में 2 लाख रुपये मिले। पढ़ाई पूरी करने के बाद जब मैं लखनऊ वापस आया तो चिनहट में 2013 में थ्रेड क्राफ्ट इंडिया की शुरुआत की। इस दौरान ज़रीना जी ने काफी मदद की। उन्हीं के जरिए चिकनकारी का काम करने वाली महिला कारीगरों तक हम पहुंच सके। हमने उन्हें अपने प्लान के बारे में बताया। शुरुआत में हमसे चार महिलाएं जुड़ीं थी। धीरे-धीरे लोग हमसे जुड़ने लगे। अब लगभग 40 महिलाएं हमारी संस्था से जुड़ चुकी हैं। सब रोजाना 6 से 8 घंटे तक चिकनकारी का काम करती हैं।’

ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ने की कोशिश


किसी भी चीज को बढ़ावा देने के लिए लोगों तक कनेक्टिविटी होना जरूरी है। मोहित का लक्ष्य है कि ज्यादा से ज्यादा लोग उनकी संस्था के बारे में जानें और मार्केट से उन्हें काम मिलने लगे। मोहित कहते हैं कि जितना ज्यादा हमको काम मिलेगा, उतना ज्यादा प्रॉफिट वर्कर्स का होगा। वर्कर्स की ज्यादा से ज्यादा आमदनी हो, यही हमारा मकसद है। हमने कोई पर्टिकुलर टारगेट नहीं सेट किया है कि इतने वर्कर्स आ गए तो काफी हैं। ऐसा कुछ नहीं है। ज्यादा से ज्यादा लोग हमसे जुड़ सकें और संस्था के बारे में जान सकें। यही टारगेट है। हमारा मेन ऐम ये ही है कि वर्कर्स को अच्छे वेजेस दे सकें। हालांकि पहले से वर्कर्स की लाइफ में भी थोड़ा सुधार आया है। पहले वे लोग जितना दिनभर मेहनत करके कमाते थे अब उससे ज्यादा कमा लेते हैं।
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