Rape victims का टू फिंगर टेस्ट सही या गलत, क्या है विशेषज्ञों की राय

उत्तर प्रदेश में 2013 में 3050 मामले दर्ज हुए लेकिन अभी भी उत्तर प्रदेश के अस्पतालों इस टेस्ट का प्रचलन बहुत अधिक है।

लखनऊ. भारत में रेप पीड़िताओं का किए जाने वाले टू फिंगर टेस्ट को लेकर बीच-बीच में आवाजें उठती रहती हैं। तमाम लोगों की इस टेस्ट को लेकर अलग-अलग धारणाएं हैं। ज्यादातर लोगों का कहना है कि ये टेस्ट रेप पीड़िता के लिए किसी मानसिक यातना से कम नहीं है। ये रेप पीड़िता का दोबारा बलात्कार करने जैसा है। आधुनिक समय में जब चिकित्सा विज्ञान इतना आगे बढ़ चुका है तो रेप पीड़िता के साथ इस तरह का पुराना और यातना भरा टेस्ट पर पूरी तरह से से बैन लगा देना चाहिए।

वहीं, उत्तर प्रदेश के अस्पतालों में ये टेस्ट अभी भी किया जाता है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में इसका प्रचलन अधिक है। भारत में रेप के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 93 महिलाओं का रेप प्रतिदिन होता है। जहां साल 2013 में 33,707 मामले दर्ज किए गए। वहीं, 2012 में 24,923 मामले दर्ज किए गए थे। इसमें उत्तर प्रदेश में 2013 में 3050 मामले दर्ज हुए, लेकिन अभी भी उत्तर प्रदेश के अस्पतालों इस टेस्ट का प्रचलन बहुत अधिक है।

आखिर क्या है टू फिंगर टेस्ट
टू फिंगर टेस्ट के माध्यम से रेप पीड़िता के कौमार्य का परीक्षण किया जाता है। इससे ये पता चलता है कि महिला के साथ संभोग हुआ है या नहीं। इस परीक्षण में महिला की योनि का टेस्ट इस धारणा के साथ किया जाता है कि संभोग के परिणामस्वरूप इसमें मौजूद हाइमन यानी योनिच्छद फट जाता है। इसमें डॉक्टर उंगलियों की संख्या के आधार पर बताते हैं कि महिला के साथ यौन संबंध बने हैं या नहीं।

दिल्ली में है इस टेस्ट पर रोक
बताते चलें कि दिल्ली सरकार की ओर से 8 जनवरी 2015 को इस टेस्ट को मंजूरी देते हुए अस्पतालों को एक एडवाइजरी जारी की थी। इस एडवाइजरी में कहा गया था कि रेप पीड़िता की मर्जी से इस टेस्ट को किया जा सकता है। इसके बाद तमाम सामाजिक संगठनों ने सरकार के इस फैसले का जमकर विरोध किया। इसके बाद सरकार ने इस एडवाइजरी को जारी करने वाले अधिकारी पर कार्रवाई की और इस टेस्ट पर रोक लगा दी गयी।

सुप्रीम कोर्ट भी लगा चुका है रोक
वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि टू फिंगर टेस्ट रेप पीड़िता को उतना ही पीड़ा पहुंचाता है, जितना दुष्कर्म के दौरान पीड़ा होती है। कोर्ट ने टिप्पणी में कहा था कि इससे दुष्कर्म पीडि़ता का अपमान होता है। यह उसके अधिकारों का हनन भी है। सरकार को इस तरह के टेस्ट को खत्म कर कोई दूसरा तरीका अपनाना चाहिए।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट
स्वस्थ भारत अभियान के अध्यक्ष आशुतोष कुमार का कहना है कि आज का समाज तकनीक के युग में जी रहा है। एक रेप पीड़िता के साथ टू फिंगर टेस्ट अमानवीय है। ये टेस्ट रेप पीड़िता का फिर से टेस्ट करने के बराबर है। इस टेस्ट पर पूरी तरह से रोक लगाई जानी चाहिए।
 
केजीएमयू के फॉरेंसिक एक्सपर्ट डॉ. अनूप वर्मा कहते हैं कि आजकल नई तकनीकों के आने से इस तरह के टेस्ट का कोई मतलब नहीं है। रेप पीड़िता की वर्जिनिटी मशीनों के माध्यम से चेक की जा सकती है। इसलिए इसे पूरी तरह से बंद कर देना चाहिए।

केजीएमयू की एक महिला डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि टू फिंगर टेस्ट हर केस में नहीं किया जाता। इस टेस्ट में उंगलियों की जगह औजार भी लगाये जा सकते हैं। यह तो केस पर निर्भर करता है कि किसमें इस टेस्ट की आवश्यकता है। हां, रेप पीड़िता की सहमति जरूरी है। इस पर टेस्ट में कोई बुराई नहीं है, समाज को रेप पीडि़ताओं के प्रति अपना नजरिया बदलना चाहिये।



Rohit Singh
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