जिन हांथों में होता था कभी झुनझुना, आज संगीनों के साए में पुलिस के लिए बना चुनौती

कहा जाता है कि कोई भी अपनी मां की कोख से अपराधी बनकर पैदा नहीं होता, किसी भी इंसान को अपराधी बनाती हैं उस इंसान की प्रवृत्तियां, परिस्थितियां व सामाजिक व्यवस्थाएं तथा समाज की सामन्तवादी मानसिकता बंदूक उठाने पर मजबूर कर देती हैं।

By: आकांक्षा सिंह

Published: 26 May 2017, 02:27 PM IST

चित्रकूट। कहा जाता है कि कोई भी अपनी मां की कोख से अपराधी बनकर पैदा नहीं होता, किसी भी इंसान को अपराधी बनाती हैं उस इंसान की प्रवृत्तियां, परिस्थितियां व सामाजिक व्यवस्थाएं तथा समाज की सामन्तवादी मानसिकता बंदूक उठाने पर मजबूर कर देती हैं। इन्ही मसलों व मुद्दों को लेकर न जाने कितनी हिंदी फिल्मों ने समाज के सामने उस सच्चाई को उकेरा जिसे नकारा जाता रहा है। कुछ ऐसी ही फ़िल्मी दास्ताने हैं चित्रकूट के पाठा क्षेत्र में पनपे खूंखार डकैतों की। कोई सामाजिक व्यवस्थाओं पर प्रहार करने के लिए बीहड़ की दुनिया में उतर गया तो कोई संगत का असर पाके जरायम की कोख में पलने लगा तो कोई अपनी आपराधिक प्रवृत्तियों के चलते संगीनों के साए में रहने लगा। इन सबके बीच जो सबसे मुख्य वजह जिम्मेदार है वो है पाठा की गरीबी बेरोजगारी भुखमरी व शिक्षा का आभाव तथा समाज की सामंतवादी मानसिकता।

यदि गहराई में जाकर मूल्यांकन किया जाए तो सिर्फ पाठा ही नहीं देश के न जाने कितने ऐसे इलाके मिलेंगे जहां इन सुविधाओं से मरहूम युवा व समाज गलत दिशा की और जा रहे हैं और देश का अहित चाहने वाले सामाजिक ठेकेदारों द्वारा उन्हें गलत दिशा की ओर मोड़ा जा रहा है। फिर भी अपराध तो अपराध होता है और अपराधी किसी भी दृष्टिकोण से समाज के लिए हितकर नहीं होता। पाठा के बीहड़ों में दहशत की इबारत लिखने वाले खूंखार डकैतों ददुआ ठोकिया रागिया बलखड़िया राजू कोल चेलवा कोल बंटी लाला( सभी मुठभेड़ में मारे गए) बबुली कोल गौरी यादव गोप्पा लवलेश कोल जैसे डकैत आज खौफ़ का दूसरा नाम बन गए हैं. समाज के बीच से ही निकले ये डकैत अपनी जाती के सर्वमान्य मसीहा साबित होते हैं जिनका तिलिस्म तोड़ने में कानून को वर्षों लग जाते हैं. इन सभी खूंखार डकैतों में किसी ने परिस्थितियोंवस बंदूक थामी तो कोई अपने समय के बड़े डकैत के सम्पर्क में आकर अपनी आपराधिक प्रवृति के कारण बीहड़ की दुनिया में कूदा, ऐसा ही एक नाम है वर्तमान में यूपी एमपी पुलिस के लिए चुनौती बना सात लाख का इनामी डकैत बबुली कोल. इस खूंखार डकैत के हांथों में कभी झुनझुना हुआ करता था लेकिन जरायम की दुनिया का ऐसा चस्का लगा की आज वही झुनझुना वाला खाकी के लिए सिरदर्द बन गया है, लगातार वारदातों को अंजाम देकर कानून व्यवस्था को चैलेंज करते हुए पुलिस को मुंह चिढ़ा रहा है.

सात लाख के इनामी डकैत बबुली कोल ने वर्तमान में ख़ाकी को खुली सब्सिडी दे रखी है कि जब चाहे मुठभेड़ कर ले क्योंकि डकैत द्वारा लगातार बड़ी वारदातों को अंजाम देने से यह स्पष्ट हो गया है कि गैंग का फायर पावर व् मुखबिर तंत्र पुलिस से कहीं ज्यादा मजबूत है. रात के सन्नाटे से लेकर दिनदहाड़े किसी भी स्तर की वारदात करने में इस दस्यु गैंग को पुलिस का ज़रा भी खौफ नहीं. पत्रिका ने पाठा के बीहड़ों में स्थित उन गांवों को करीब से जाना समझा जो इन खूंखार डकैतों की दहशत के साए में सांसे ले रहे हैं. डकैत बबुली कोल के गांव जहां पुलिस भी दिन के उजाले में जाने से कतराती है वहां भी पत्रिका ने खौफ का मंजर देखा और एक दूसरे पहलू को जानने समझने की कोशिश की कि आखिर बीहड़ के युवा क्यों उतर जाते हैं जरायम की दुनिया में.

झुनझुना से बंदूक तक

वर्तमान में यूपी एमपी पुलिस के लिए यक्ष प्रश्न बना सात लाख का इनामी डकैत बबुली कोल का गाँव डोडा सोसाइटी कोलान जो चित्रकूट के मारकुंडी थाना क्षेत्र अंतर्गत स्थित है. घोर जंगल व् बीहड़ों के बीच बसा यह गांव एक अजीब से सन्नाटे में अंगड़ाई ले रहा है और कानून के पहरेदारों के बीच ख़ास पहचान बना चुका है, ऐसा इसलिए क्योंकि इसी गाँव का एक युवक जो दिखने में साधारण सा कोल आदिवासी हुआ करता था वही युवक आज पुलिस की नजर में मोस्ट वांटेड है उस पर सात लाख का इनाम है.

पत्रिका ने जब गांव के बाशिंदों से बात करनी चाही तो उनके चेहरे से लेकर आँखों में साफ़ झलक रहा था कि इन्हें किसी की दहशत ने घेर रखा है, अलबत्ता गांव का सन्नाटा दिन के उजाले में बहुत कुछ बयां कर रहा था. कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जो कैमरे के सामने बोलना तो दूर अपनी तस्वीर भी खिंचवाना पसन्द करे क्योंकि उन्हें अपनी जिंदगी प्यारी है न कि मीडिया के कैमरे.

काफी प्रयासों के बाद जब कुछ पुराने ग्रामीण व् बुजुर्ग बात करने को राजी हुए तो वो भी शर्तों के साथ. वर्तमान में पुलिस को खुली चुनौती दे रहे डकैत बबुली कोल के बारे में जो बताया गया वो किसी फ़िल्मी कहानी से कम नहीं लगता. डकैत बबुली कोल कभी झुनझुना बजाया करता था गांव व् आस पास के इलाकों में. शादी ब्याह आदि शुभ अवसरों पर आस पास की बैंड पार्टियों में शामिल होकर मदमस्त होते हुए झुनझुना बजाकर लोगों का मनोरंजन करता था.

चूंकि बबुली कोल का गांव बीहड़ में स्थित है इसलिए उस इलाके में 5 लाख के इनामी रहे खूंखार डकैत बलखड़िया का भी आना जाना था. यूँ तो बलखड़िया का गाँव बबुली कोल के गाँव से 25 किलोमीटर दूर पड़ता था. गीत संगीत के प्रेमी डकैत बलखड़िया उस इलाके के अपने संरक्षणदाताओं के माध्यम से बबुली कोल को गैंग का मनोरंजन करने के लिए बुलाता था. शुरू से ही थोडा आपराधिक प्रवृत्ति के रहे बबुली कोल के अंदर छुपे बीहड़ के बादशाह को बलखड़िया ने देख लिया और गैंग में शामिल करते हुए उसे भोजन लाने व् अन्य कार्यों को करने की जिम्मेदारी दी. धीरे धीरे बबुली के हांथो से झुनझुना छूटता गया और मौत की मशीन राइफल अपनी पकड़ मजबूत करती गई. साधारण बबुली कोल बन गया डकैत बबुली कोल. बलखड़िया का दाहिना हांथ कहा जाने लगा बबुली. पहले 5 हजार फिर 50 हजार फिर 1 लाख और फिर क्रूरता के नम्बर एक पायदान पर पहुंचते ही बबुली कोल पर इनाम हो गया सात लाख.

जघन्य वारदातें हैं बबुली के नाम

अपने आक़ा बलखड़िया के नक्शेकदम पर चलते हुए मुखबिरों को बेरहमी से मौत के घाट उतारने वाले खूंखार डकैत बबुली कोल ने बलखड़िया के साथ कई जघन्य वारदातों को अंजाम दिया. 8 अगस्त 2012 को जनपद के मारकुंडी थाना क्षेत्र स्थित डोडामाफी गांव में एक ही परिवार के पांच लोगों की बबुली कोल ने बेरहमी से गोली मारकर हत्या कर दी थी. मृतक में महिलाएं व् बच्चे भी शामिल थे. इस वारदात को बबुली ने अकेले तथा गैंग के अन्य सदस्यों के साथ अंजाम दिया था. घटना के बाद रातों रात डकैत बबुली कोल दहशत का पर्याय बन गया. इससे पहले सन 2011 में बहिलपुरवा थाना क्षेत्र में एक ही महीने में बबुली ने बलखड़िया के साथ मिलकर तीन लोगों को मुखबिरी के शक में गोलियों से छलनी कर मौत की नींद सुला दी थी.

वर्तमान में भी डकैत बबुली कोल ने हफ्ते भर के अंदर लूट व् मारपीट की बड़ी घटनाओं को अंजाम देकर पुलिस की नींद उड़ा रखी है. मारकुंडी थाना क्षेत्र में पड़ने वाले अधिकांश गांव दिन के उजाले में रात के सन्नाटे जैसी जिंदगी जी रहे है. कोई कुछ भी बताने बोलने को तैयार नहीं अलबत्ता पुलिस के खिलाफ जरूर आक्रोश है.

बहरहाल खौफ़ का सीना चीरते हुए पत्रिका ने दस्यु प्रभावित जिन इलाकों की तस्वीर देखी उससे यह निष्कर्ष जरूर निकला कि अभी बहुत कुछ बांकी है समाज के रहनुमाओं को करने के लिए, प्रशासन को विश्वास जीतने के लिए और सरकारों को अंतिम पायदान पर खड़े आम इंसान तक पहुंचने के लिए, और शायद तभी पाठा ही नहीं देश का अधिकांश इलाका दहशत से आजाद होगा.
आकांक्षा सिंह
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned