चुनाव अभी दूर लेकिन चर्चा सिर्फ जातियों की

congresयूपी में राजनीतिक पार्टियां जातिगत आधार पर प्रत्याशियों का चयन कर रही हैं। जाति के आधार पर पार्टी सम्मेलन हो रहे हैं। प्रबुद्ध सम्मेलन के नाम पर बसपा ब्राह्मणों के उत्पीडऩ के मामले गिना रही है।

By: Mahendra Pratap

Updated: 07 Sep 2021, 04:43 PM IST

up diary खनऊ. (महेंद्र प्रताप सिंह). जातिगत चुनाव उप्र का दुर्भाग्य है। यूपी में अब 18वीं विधानसभा up election 2022 के चुनाव की तैयारियां जोर पकडऩे लगी हैं। इसी के साथ एक बार फिर जातियों की चर्चा चल पड़ी है। राजनीतिक पार्टियां जातिगत आधार पर प्रत्याशियों का चयन कर रही हैं। जाति के आधार पर पार्टी सम्मेलन हो रहे हैं। प्रबुद्ध सम्मेलन के नाम पर बसपा ब्राह्मणों के उत्पीडऩ के मामले गिना रही है। सपा अपनी रैलियों में जगह-जगह परशुराम की प्रतिमाएं लगाने की बात कर रही है। ...तो निषाद और वीआइपी पार्टी को 40 साल बाद दस्यु सुंदरी फूलन देवी के उत्पीडऩ की याद आ रही है। इन दोनों पाटियों में भी फूलन की मूर्तियां लगवाने की होड़ है। रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजाभैया का जनसत्ता दल, जनसेवा संकल्प यात्रा के जरिए क्षत्रिय स्वाभिमान के मुद्दे को गरमाने की कोशिश में है। इस भेड़चाल में भाजपा भी शामिल है। पिछड़ी जातियों के मोहपाश से वह मुक्त नहीं हो पा रही। वह भी जातियों को मनाने की कवायद में जुटी है। आजादी के 74 साल बाद भी विकास की राजनीति पर कहीं कोई चर्चा नहीं है।

बुखार से मौतों पर चर्चा नहीं
पूर्वी उत्तर प्रदेश की बहुत बड़ी आबादी बाढग़्रस्त है। नेपाल की नदियों ने गोरखपुर मंडल के जिलों में तबाही मचा रखी है। चार साल के बाद एक बार फिर इंसेफेलाइटिस से बच्चे बुखार में तप रहे हैं। पश्चिमी यूपी में इन दिनों विचित्र बुखार स्क्रब टाइफस कहर बरपा रहा है। लेकिन, इन मुद्दों और समस्याओं पर पार्टियों का मुंह नहीं खुल रहा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की वकालत की है। मशहूर शायर मुनव्वर राणा भी अपने बयानों की वजह से चर्चा में हैं। पाटियों के लिए गाय और मुनव्वर दोनों ही मुफीद विषय हैं। इसलिए पार्टी सम्मेलनों, पद यात्राओं में इन पर बात हो रहे रही है। जयकारे लग रहे हैं। निंदा प्रस्ताव पारित किये जा रहे हैं। किसानों, युवाओं की समस्याएं नदारद हैं। देश का सबसे बड़ा राज्य जाति और पंथ के मकडज़ाल में फिर उलझा हुआ है। कोविड त्रासदी सेे प्रदेश की आर्थिक व्यवस्था वेंटिलेटर पर है। नेताओं की जुबान से यह मुद्दे भी गायब हैं। सभी दलों को अपने-अपने वोटबैंक की ङ्क्षचता है। शायद यह चुनाव भी जातियों के आधार पर ही लड़ा जाएगा। लगता है उप्र की यही नियति है।

Mahendra Pratap
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