scriptUttar Pradesh Police again under question over custodial death | Opinion : देश में सर्वाधिक हिरासत में मौत, यूपी पुलिस फिर सवालों के घेरे में | Patrika News

Opinion : देश में सर्वाधिक हिरासत में मौत, यूपी पुलिस फिर सवालों के घेरे में

UP Prasangvash : यूपी पुलिस का रवैया लगातार उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की छवि को खराब कर रहा है। पुलिस हिरासत में हुई मौतों का मामला हो या फिर गोरखपुर में कानपुर के कारोबारी मनीष गुप्ता की पुलिसकर्मियों द्वारा हत्या का मामला हो। इन मामलों में विपक्ष को योगी सरकार को घेरने का मौका मिला है। ताजा मामला आगरा के जगदीशपुरा थाने का है। पुलिस कस्टडी में हुई सफाई कर्मी की मौत से पुलिस के रवैये पर फिर से सवाल उठने लगे हैं।

लखनऊ

Published: October 21, 2021 05:04:25 pm

लोकेश वर्मा

UP Prasangvash : यूपी पुलिस का रवैया लगातार उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की छवि को खराब कर रहा है। पुलिस हिरासत में हुई मौतों का मामला हो या फिर गोरखपुर में कानपुर के कारोबारी मनीष गुप्ता की पुलिसकर्मियों द्वारा हत्या का मामला हो। इन मामलों में विपक्ष को योगी सरकार को घेरने का मौका मिला है। ताजा मामला आगरा के जगदीशपुरा थाने का है। यहां पुलिस की नाक के थाने के मालखाने में 25 लाख रुपए और 2 पिस्टल चोरी हुए थे। इस मामले में शक के आधार पर पुलिस ने एक सफाई कर्मचारी को हिरासत में लिया था। लेकिन, पुलिस कस्टडी में हुई सफाई कर्मी की मौत से पुलिस के रवैये पर फिर से सवाल उठने लगे हैं।
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विपक्षी दलों ने भी आगरा के मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। अखिलेश यादव ने कहा है कि भाजपा सरकार में पुलिस खुद अपराध कर रही है तो अपराध कैसे रुकेगा? पहले मालखाने से 25 लाख की चोरी कराई गई फिर सच छिपाने के लिए गिरफ्तार सफाईकर्मी की पुलिस हिरासत में हत्या स्तब्ध करती है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने कहा है कि किसी को पुलिस हिरासत में पीट-पीटकर हत्या करना कहां का न्याय है?
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अपराधियों के खिलाफ चलाए गए 'मिशन क्लीन' अभियान के नाम पर बेलगाम हुई यूपी पुलिस सरकार की छवि खराब करने से बाज नहीं आ रही है। हाल ही में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिससे योगी सरकार की छवि खराब हुई है। आंकड़ों पर गौर करें तो यूपी पुलिस एनकाउंटर के साथ ही हिरासत में मौत के मामलों सबसे आगे है। उत्तर प्रदेश में पिछले तीन साल में 1318 लोगों की हिरासत में मौत हुई, जो देश के कुल मामलों का करीबन 23 प्रतिशत है। एनएचआरसी के अनुसार, 2018-19 में पुलिस हिरासत में 12 तो 452 की मौत न्यायिक हिरासत में हुई थी। जबकि 2019-20 में पुलिस हिरासत में 3 तो 400 की मौत न्यायिक हिरासत में हुई। जबकि 2020-21 में पुलिस हिरासत में 8 तो न्‍यायिक हिरासत में 443 मौत हो चुकी है।
अब सवाल ये उठता है कि जब पुलिस हिरासत में किसी की मौत होती है‌ तो पूरे स्टाफ को इसकी जानकारी होती है। लेकिन, कई बार ये देखा जाता है कि जिम्मेदार अधिकारी ही केस दबाने का प्रयास करते हैं। यह अवधारणा बिल्कुल गलत है। इसलिए पुलिस की कार्यप्रणाली में काफी सुधार होना चाहिए। पुलिसकर्मियों को लोगों के प्रति अपना व्यवहार सुधारना चाहिए। इसके साथ ही पारदर्शिता लाने के लिए हर थाने में सीसीटीवी कैमरों की व्यवस्था की जानी चाहिए।

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