इस लॉ के तहत शिवपाल की विधायकी जाना तय, अखिलेश ने लगाया बहुत बड़ा दिमाग, जानिए क्या है ये नियम

क्या है Anti Defection Law जिसके तहत शिवपाल की विधायकी होगी खत्म

 

By: Ruchi Sharma

Updated: 13 Sep 2019, 02:48 PM IST

लखनऊ. लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद भी समाजवादी पार्टी (Samajwadi party) (एसपी) के अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव में चल रही कटुता खत्‍म होने का नाम नहीं ले रही है। अखिलेश यादव ने विधानसभा अध्यक्ष से एंटी डिफेक्शन लॉ (Anti Defection Law) यानि दलबदल विरोधी कानून के तहत जसवंतनगर विधानसभा सीट से विधायक शिवपाल सिंह यादव को अयोग्य करार दिए जाने की मांग की है। क्या आप जानते हैं एंटी डिफेक्शन लॉ क्या है।

क्या है दलबदल विरोधी कानून

दल बदल की स्थिति तब होती है जब किसी भी दल के सांसद या विधायक अपनी मर्जी से पार्टी छोड़ते हैं या पार्टी व्हिप की अवहेलना करते हैं। इस स्थिति में उनकी सदस्यता को समाप्त किया जा सकता है और उनपर दल बदल निरोधक कानून लागू होगा। पर यदि किसी पार्टी के एक साथ दो तिहाई सांसद या विधायक (पहले ये संख्या एक तिहाई थी) पार्टी छोड़ते हैं तो उन पर ये कानून लागू नहीं होगा पर उन्हें अपना स्वतन्त्र दल बनाने की अनुमति नहीं है वो किसी दूसरे दल में शामिल हो सकते हैं।

कब बना यह कानून

इस कानून को बनाने और लागू होने में काफी वक्त लगा। शुरुआत में दल बदल विरोधी कानून यानी कि एंटी डिफेक्शन लॉ की बुनियादी प्रावधानों पर कोई सहमति नहीं थी। संसद के सदस्य संसद और अन्य विधानसभाओं में बोलने की स्वतंत्रता को लेकर चिंतित थे क्योंकि उन्हें डर था कि दलबदल पर सख्त कानून से विधायकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगेगा। साल 1985 में राजीव गांधी सरकार संविधान में संशोधन करने और दलबदल पर रोक लगाने के लिए एक विधेयक लाई 1 मार्च 1985 खोया लागू हो गया। संविधान की दसवीं अनुसूची जिसमें दल बदल विरोधी कानून शामिल है। इस संशोधन के माध्यम से संविधान में जोड़ा गया।

क्यों पड़ी जरूरत

-लोकतांत्रिक प्रक्रिया में राजनीतिक दल सबसे अहम् हैं और वे सामूहिक आधार पर फैसले लेते हैं।
-लेकिन आज़ादी के कुछ वर्षों के बाद ही दलों को मिलने वाले सामूहिक जनादेश की अनदेखी की जाने लगी।
-विधायकों और सांसदों के जोड़-तोड़ से सरकारें बनने और गिरने लगीं। 1960-70 के दशक में ‘आया राम गया राम’ अवधारणा प्रचलित हो चली थी।
-जल्द ही दलों को मिले जनादेश का उल्लंघन करने वाले सदस्यों को चुनाव में भाग लेने से रोकने तथा अयोग्य घोषित करने की ज़रूरत महसूस होने लगी।
-अतः वर्ष 1985 में संविधान संशोधन के ज़रिये दल-बदल विरोधी कानून लाया गया।

दल-बदल अधिनियम के अपवाद

यदि कोई व्यक्ति स्पीकर या अध्यक्ष के रूप में चुना जाता है तो वह अपनी पार्टी से इस्तीफा दे सकता है और जब वह पद छोड़ता है तो फिर से पार्टी में शामिल हो सकता है। इस तरह के मामले में उसे अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। यदि किसी पार्टी के एक-तिहाई विधायकों ने विलय के पक्ष में मतदान किया है तो उस पार्टी का किसी दूसरी पार्टी में विलय किया जा सकता है।

Ruchi Sharma
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