कर्मा और भाग्य का सिद्धांत : ज्योतिष विश्लेषण

जीवन में हम कर्म के माध्यम से जो चाहे वो पा सकते हैं। वह कर्म को ही भगवान मानते हैं।

 

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Published: 12 Oct 2018, 09:29 PM IST

लखनऊ. कुछ प्रश्न अदि काल से मनुष्य जाति को परेशान और हैरान करते आये हैं, जैसे कि मुर्गी पहले आई या अंडा? कुछ इसी तरह का विरोधाभास हमें कर्मा और भाग्य सिद्धांतो में भी मिलता है। प्राय: यह बहस अक्सर छिड़ जाती है की मानव जीवन में किस वास्तु का ज्यादा महत्व है भाग्य का या कर्मा का? अब कर्मवादी सिद्धांत मानाने वाले तर्क रखते हैं की यह संसार कर्म के सिद्धांतो पर ही टिका है। जीवन में हम कर्म के माध्यम से जो चाहे वो पा सकते हैं। वह कर्म को ही भगवान मानते हैं। उनके अनुसार "देव देव अलसी पुकारा" वाली कहावत भाग्यवादी लोग के लिए ही बनी है। कर्मवादी व्यक्ति मानता है की पुरुष अपने पुरुषार्थ के बल पर जीवन में वो हर चीज़ प्राप्त कर सकता है जिसकी उसे लालसा या आकांशा है। देवी भागवत महापुराण में भी कहा गया है- "उद्यमं साहसं धैर्यं बुद्धि शक्ति पराक्रम:। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैव सहायकृत" ।। अर्थात यदि आप चाहते हैं कि आपका भाग्य फले, आपका भाग्य-सौभाग्य में बदलें तो उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम को अपनाओ, ईश्वर आपकी मदद करेगें।

फिर हम मनुष्यों की तो गिनती करना ही बेमानी है
भाग्यवादी मनुष्य इसके इतर सोच रखता है, उसके अनुसार जीवन में घटने वाली हर घटना भाग्य पर निर्भर करती है। प्राय: लोग यह कहते हुए आपको मिल जायेंगे की ईश्वर की इच्छा के बिना तो एक पत्ता तक नहीं हिल सकता, फिर बाकि बातों की तो बात ही छोड़ दीजिये। रामायण में भी कहा गया है की "होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ ***** कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥" अर्थात जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे। (मन में) ऐसा कहकर शिवजी भगवान श्री हरि का नाम जपने लगे और सतीजी वहाँ गईं, जहाँ सुख के धाम प्रभु श्री रामचंद्रजी थे॥
यह प्रसंग उस समय का है जब माता सतीजी ने श्रीशिव भगवान् की बात पर विश्वास नहीं किया कि श्रीरामजी ही परमब्रह्म और ईश्वर हैं और माता सतीजी श्रीराम जी की परीक्षा लेने जा रही थी। इस प्रसंग से भाग्यवादी सोच वाले लोगों को संबल मिलता है की जब सदाशिव और माता भागवती भी नियति के खेल का शिकार हो सकती है फिर हम मनुष्यों की तो गिनती करना ही बेमानी है।

हमें दोनों पैरो की जरुरत होती है

यहाँ धर्मसंकट खड़ा होता है की फिर जीवन में किस चीज़ को हम पतवार बना कर आगे चले? कर्म को या भाग्य को? जिन लोगों ने जीवन को बहुत नज़दीक से अनुभव किया है वो आपको यही बताएँगे की कर्म और भाग्य को स्थूल रूप से दो अलग-अलग वास्तु प्रतीत हो रही है। वास्तव में एक ही कड़ी के दो पहलू हैं। कर्मा और भाग्य हमारे दो पैरो की तरह, जो एक दूसरे का अनुसरण करते हैं, कभी आपको कर्म का पैर आगे दिखता है तो कभी भाग्य का पैर। परन्तु वस्तुस्थिति यह है की जीवन में आगे चलने के लिए हमें दोनों पैरो की जरुरत होती है। इस बात को आप यूँ भी समझ सकते हैं की जैसे कपड़े को काटने के लिए कैची की दोनों धारों का होना अवाशक है वैसे जीवन में आगे अग्रसर होने के लिए भी दोनों वस्तुओं की जरुरत पड़ती है। कर्म से भाग्य का निर्माण होता है और भाग्य के सहयोग द्वारा बेहतर कर्म करने का अवसर हमें मिलता है।

अनचाहे हमें अपनी गिरफ्त में ले ही लेते हैं
ज्योतिष के दृष्टिकोण से अगर हम देखेंगे तो इस तथ्य को और बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। ज्योतिष के अनुसार कर्मो को तीन प्रमुख धाराओ में बंटा गया है। संचित, प्रारब्ध एवं क्रियमाण कर्म। संचित कर्म वह कर्मों का लेखा जोखा है जो अदि काल से विभिन्न योनियों में जन्म लेने के कारण बने हैं। उन्हीं संचित कर्मों में से कुछ कर्म प्रारब्ध के रूप में इस जनम में हमें मिला है, जिसे हम सामान्य भाषा में भाग्य का दर्जा दे देते हैं। प्रारब्ध को भोगना ही पड़ता है, वह हमारे मार्ग में पडऩे वाले वो सुख और दु:ख के समय हैं जो चाहे अनचाहे हमें अपनी गिरफ्त में ले ही लेते हैं।

ज्योतिष हमें हमारे प्रारब्ध से परिचय करता है
यही वो प्रारब्ध है जिससे भाग्यवादी लोग नियति का दर्जा दे देते हैं। अंतिम कर्म के रूप में क्रियमाण कर्म आता है, यह वर्तमान में हमारे द्वारा किया गया कर्म है। हम अपने प्रारब्ध को किस तरह से जीवन में सामना करते हैं उसे ही क्रियमाण कर्म कहते हैं। यही वो क्रियमाण कर्म है जिसे कर्मवादी लोग पुरुषार्थ का नाम देते हैं। ज्योतिष हमें हमारे प्रारब्ध से परिचय करता है, वह उन सीमओं का निर्धारण करता है जिस के मध्य रह कर हमें अपने जीवन का निर्वहन करना है। साथ ही साथ ज्योतिष हमें क्रियमाण कर्म के द्वारा वह उपाय बताता है जिससे की हम अपने प्रारब्ध को बेहतर तरीके से निर्वाह कर सकते है। आप इस बात को इस तरह समझ सकते हैं की जैसे बाहर बारिश हो रही है, यह हमारा प्रारब्ध है। अब बारिश से अगर आप बचना चाहते हैं तो हम बरसाती ले सकते हैं, यही उपाय ज्योतिष हमें बताती है।
-पंडित प्रखर गोस्वामी

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