पाथ के सहयोग से एरा मेडिकल कॉलेज में हुयी फाइलेरिया पर कार्यशाला

मानव् शरीर के अंगों जैसे हाथ, पैर, स्तन, अंडकोष में सूजन बढ़ने लगती है ।

By: Ritesh Singh

Published: 11 Oct 2021, 08:21 PM IST

लखनऊ, एरा मेडिकल कॉलेज के तत्वावधान में पाथ संस्था के सहयोग से एरा मेडिकल कॉलेज सभागार में फाइलेरिया को लेकर एक सेमिनार की आयोजन किया गया। इस मौके पर कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष डा.के.एस.श्रीवास्तव ने बताया- फाइलेरिया बीमारी क्यूलेक्स और मैनसोनाइडिस प्रजाति के मच्छरों से होती है। यह मच्छर जब किसी मानव को काटता है तो यह एक पतले धागे जैसा परजीवी मानव शरीर में छोड़ता है। मादा परजीवी, नर परजीवी के सम्पर्क में आकर लाखों माइक्रोफाइलेरिया नामक भ्रूणों को जन्म देता है। यह माइक्रोफाइलेरिया रात के समय में प्रभावी होते हैं । उन्होंने कहा कि फाइलेरिया बीमारी एक छुपा हुआ दुश्मन है क्योंकि इसके लक्षण संक्रमण के 7-8 सालों बाद कई बार तो 10-12 सालों बाद नजर आते हैं। ऐसी स्थिति में मानव् शरीर के अंगों जैसे हाथ, पैर, स्तन, अंडकोष में सूजन बढ़ने लगती है ।

इंटरनल मेडिसिन विभाग के चिकित्सक डॉ. वैभव शुक्ला ने बताया - फाइलेरिया दुनिया की दूसरे नम्बर की ऐसी बीमारी है जो बड़े पैमाने पर लोगों को दिव्यांग बना रही है । इसके जीवाणुओं की संख्या अधिक होने के कारण प्रभावित अंगों में दर्द, लालपन एवं रोगी को बुखार हो जाता है। फाइलेरिया प्रभावित अंगों में शुरुआत में सूजन के लक्षण होते हैं बाद में यही सूजन स्थायी और लाइलाज हो जाती है। उन्होंने कहा कि इस बीमारी की वजह से मौत भले ही न हो लेकिन इस बीमारी से व्यक्ति मृत के समान हो जाता है। कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के सहायक प्रोफेसर डा.आबिद सगर ने बताया – क्यूलेक्स और मैनसोनाइडिस प्रजाति के मच्छरों के जीवन चक्र की जानकारी दी।

सीनियर प्रोग्राम ऑफिसर डा.शोएब अनवर ने बताया - जब तक किसी व्यक्ति के फाइलेरिया से पीड़ित होने का पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। दुर्भाग्य की बात यह भी है कि इस बीमारी का कोई कारगर इलाज नहीं है। इसकी रोकथाम ही इसका समाधान है। फ़ाइलेरिया के उन्मूलन के लिए केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय फ़ाइलेरिया उन्मूलन, एमडीए (मॉस ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन) नामक कार्यक्रम चलाया जा रहा है। फाइलेरिया परजीवी की औसतन आयु 8-10 वर्ष की होती है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को इस अभियान के दौरान 5 सालों तक लगातार फाइलेरिया से बचाव की दवा ( डाई इथाइल कार्बामजीन एंड एलबेंडाजोल) खानी चाहिए, जिससे की वह फाइलेरिया जैसी घातक बीमारी को मच्छरों के काटने से फैलने से रोक सकें।

सामान्य लोगों में ,जिनके शरीर में फाइलेरिया रोग के कीटाणु नही होते हैं, उनमे इस दवा के सेवन से कोई प्रतिकूल प्रभाव नही पड़ता है। दवा के सेवन से जब शरीर में फाइलेरिया कृमि मरते है तो बुखार , खुजली , उलटी जैसे लक्षण हो सकते हैं जो स्वत : तीन से चार घंटे में समाप्त हो जाते हैं । इसीलिए घबराने की जरूरत नहीं है । उन्होंने यह भी बताया कि यह दवा दो वर्ष से कम बच्चों , गर्भवती और अत्यंत गंभीर बीमारी से पीड़ित लोगों को नहीं दी जानी है।

डिप्टी डायरेक्टर अमरेश कुमार ने बताया- कि कालाजार सैंड फ्लाई (बालू मक्खी) से फैलने वाली एक जानलेव बीमारी है। यह मक्खी नमी वाले स्थानों पर अंधेरे में पाई जाती है। यह 6 फीट ही उड़ पाती है। इसके काटने से बुखार आता है। जो कि रुक –रुक कर चढ़ता और उतरता है । इस बीमारी में रोगी का पेट फूल जाता है, भूख कम लगती है और शरीर काला पड़ जाता है। काला जार के रोगी में दो सप्ताह से अधिक समय का बुखार, तिल्लियों एवं यकृत के बढ़ने के कारण पेट में सूजन एवं दुर्बलता या जाती है । अभी तक यह माना जाता था कि यह बीमारी समाप्त होने के कगार पर है किन्तु हालिया वर्षों में यह बीमारी गोंडा, बहराइच और लखीमपुर जनपदों में पायी गई है ।

एरा मेडिकल कॉलेज के चिकित्सक डा. अवि सिंह ने बताया- एक अन्य प्रकार का काला जार जिसे पीकेडीएल कहते हैं जिसमें शरीर में सफेद चकत्ते पड़ जाते हैं । यह भी इन जिलों में देखने को मिला है । उन्होंने बताया- काला जार एवं पीकेडीएल की जांच एवं उपचार की सुविधा सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर निःशुल्क उपलब्ध है। शीघ्र ही यह सुविधा एरा मेडिकल कॉलेज में भी उपलब्ध हो जाएगी।

Ritesh Singh
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