सपा-बसपा को गठबंधन को लेकर बदलाना पड़ेगा अपना मन, तीन राज्यों में कांग्रेस की जीत रंग लाएगी!

सपा-बसपा को गठबंधन को लेकर बदलाना पड़ेगा अपना मन, तीन राज्यों में कांग्रेस की जीत रंग लाएगी!
अखिलेश यादव, मायावती और राहुल गांधी

Mohd Rafatuddin Faridi | Publish: Dec, 12 2018 04:32:55 PM (IST) | Updated: Dec, 12 2018 04:44:20 PM (IST) Mahrajganj, Mahrajganj, Uttar Pradesh, India

तीन राज्यों में कांग्रेस की जीत से यूपी में बदलेगा महागठबंधन का स्वरूप, मध्य प्रदेश व राजस्थान में सपा बसपा ने दिया है कांग्रेस को समर्थन।

महराजगंज. पांच राज्यों में से तीन पर कांग्रेस के विजय पताका फहराने से यूपी के कांग्रेसी भी उर्जावान हो उठे हैं। अब उनमें 2019 में लोकसभा का चुनाव फतह करने की उम्मीद जग गई है। लेकिन क्या कांग्रेस का जैसा संगठन है यूपी के जिलों में उससे उनकी उम्मीदों को पूरा होते देखा जा सकता है। यूपी में न तो सचिन पायलेट हैं और न माधव राव सिंधिया और न ही गहलौत और न ही छत्तीस गढ़ जैसे बघेल और सिंहदेव ही हैं। यहां हैं सिर्फ राजबब्बर! यूपी के कांग्रेसी अभी भी राज बब्बर में फिल्मी ग्लैमर देख रहे हैं लेकिन अब उनमें वह चार्म नहीं रह गया जो एक दशक पहले था। हां इसके बावजूद राज बब्बर के मेहनत पर अंगुली नहीं उठाई जा सकती। सच यह है कि यदि उन्हें माइनस कर दिया जाय तो यूपी में कांग्रेस का बेहोशी की हालत में आना तय है।

 

महराजगंज के लोकतंत्र रक्षक सेनानी जय प्रकाश लाल कहते हैं कि अब यूपी में गठबंधन की कवायद तेज होगी और जो दल कांग्रेस को ब्लेकमेल करना चाह रहे थे,वे अब अपने निर्णय पर पुर्नविचार करने को मजबूर होंगे। कहा आज की कांग्रेस राहुल गांधी की है जिसे अंडरइस्टीमेट करने की चूक का मतलब क्षेत्रीय दलों को अपने राजनीतिक दल का अंतिम यात्रा निकालना होगा। लेकिन क्या बिना संगठन के कांग्रेस यूपी में वैसा प्रदर्शन कर सकेगी जैसा चुनाव वाले तीनों राज्यों में हुआ है? कांग्रेस के लिए यह बड़ा सवाल है। यूपी कांग्रेस के पूर्व महासचिव तथा दर्जा प्राप्त पूर्व राज्यमंत्री नर्वेदश्वर शुक्ल कहते हैं कि बेशक राहुल गांधी पार्टी की कमान संभालने के मात्र एक साल बाद ही करिश्माई व्यक्तित्व के रूप में उभरे हैं लेकिन इसके पीछे मध्य प्रदेश छत्तीस गढ़ तथा राजस्थान का पार्टी संगठन भी रहा है। यूपी में इसका अभाव है। यहां भी उसी तरह जिला तहसील ब्लाक स्तर तक के संगठन को सक्रिय और मजबूत किए जाने की जरूरत है और इसके लिए हम लोग शीघ्र ही तनमन से लगने जा रहे हैं।

 

तीनों प्रदेशों में कांग्रेस के पक्ष में चुनाव परिणाम आने के साथ ही इस बात पर भी चर्चा चल रही है कि तेलांगाना में कांग्रेस टीडीपी से गठबंधन के बाद भी कुछ नहीं कर सकी और मिजोरम में अपनी सत्ता भी नहीं बचा पाई। एडवोंकेट अरविंद मिश्र कहते हैं कि कांग्रेस समझ नहीं पाई। सच्चाई यह है कि तेलांगानों के लोग अभी भी चंद्र बाबू नायडू को खलनायक की दृष्टि से देखते हैं। उनके साथ गठबंधन कर कांग्रेस का नुकशान हुआ। यदि वह अकेले लड़ी होती तो शायद बेहतर स्थित में हेाती। अफसोस कि कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी की उस मार्मिक अपील पर भी तेलांगाना वासियों ने गौर नहीं किया कि तेलांगाना को मैने दिया है। सोनिया की उस सभा की भीड़ को देख एक बार लगा कि तेलांगाना भी कांग्रेस के हिस्से में आ रहा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अरविंद मिश्र कहते हैं कि तेलांगाना में चंद्र बाबू नायडू के प्रति गुस्से को देख कहा जा सकता है कि ऐसा ही गुस्सा उत्तराखंड वासियों में मुलायम के प्रति बना हुआ है।

 

यूपी में जब सपा बसपा के साथ कांग्रेस के गठबंधन की संभावना पर बात होती है तब यह सवाल भी उठता है कि सपा या बसपा यदि मध्य प्रदेश तथा राजस्थान में कांग्रेस के गठबंधन का हिस्सा होते तो कुछ और बात होती। इस सवाल पर जिला समाजवादी पार्टी के पूर्व उपाध्यक्ष अशोक यादव कहते हैं कि हां सचमुच और बात होती जो कांग्रेस के हित में नहीं होती। उन्होंने कहा कि राजस्थान तथा मध्य प्रदेश का यादव भाजपा के साथ जुड़ा हुआ है। वहां सपा का अलग लड़ना कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित हुआ। यादव वोट जो भाजपा को पोल होते वे भारी मात्रा मे सपा को पोल हुए और इसका फायदा कांग्रेस को मिला।

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