10 साल बीत गए पर नहीं मिली जमीन

10 साल बीत गए पर नहीं मिली जमीन

Shiv Mangal Singh | Publish: Jun, 14 2018 07:48:07 PM (IST) Mandla, Madhya Pradesh, India

आदिवासी परिवार तरस रहा पट्टे के लिए

मंडला. 15 दिसम्बर 2006 को पारित वनाधिकार कानून का मुख्य उद्देश्य वनाश्रित समुदायों पर किये गये अन्याय को खत्म करते हुये उन्हें मालिकाना हक दिलाना और पर्यावरण की रक्षा में समुदायों की भूमिका को मजबूत करना ही रहा है। वनाधिकार कानून में दो प्रमुख अधिकारों को मान्यता दी गई है। पहला, वन क्षेत्र के अंदर जिस जमीन और जंगल पर लोग अपनी आजीविका चला रहे है उस पर और उनकी आवासीय जमीन पर मालिकाना अधिकारी और दूसरा, पूरे वन क्षेत्र पहुंच और लघु वनोपज पर वनाश्रित समुदाय का समुदायिक मालिकाना अधिकार। कानून में यह भी कहा गया है कि ये अधिकार समुदाय द्वारा चुनी गई ग्राम सभा ही तय करेगी जहां शासन-प्रशासन का किसी प्रकार का कोई दखल नहीं होगा लेकिन आज भी जमीनी स्तर पर ठीक इसका उलटा हो रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं वे २५ आदिवासी परिवार, जो लगभग १० वर्षों से वन भूमि के पट्टे के लिए भटक रहे हैं।
वनाधिकार कानून का पालन कहने को तो किया जा रहा है पर इसका पालन जिस तरीके से हो रहा है उससे वनाश्रित समुदायों को इसका वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा है। जिले में मुख्य बसाहट आदिवासी वर्ग की है खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में 80 प्रतिशत के लगभग आदिवासी समाज के लोग निवास करते है जिले में वन क्षेत्र का रकबा भी काफी बड़ा है जिसके कारण आदिवासी समाज के अनेक ग्रामों में वन क्षेत्रों के माध्यम से ही उनकी जीविका सुनिश्चित होती है। जिले में वनाधिकार कानून के तहत बहुत से व्यक्तिगत व सामुदायिक दावे स्वीकृत तो किये गये हैं पर उनमें से अधिकांश अब भी मालिकाना हक से वंचित है।
दर-दर भटक रहे है 25 परिवार
वनाधिकार के परिपालन में जिले का सबसे ज्यादा पेचीदा मामला विकासखण्ड निवास की ग्राम पंचायत हिरनाछापर के ग्राम बसगढ़ी का है जहां 25 आदिवासी परिवार पिछले 10 साल से वन भूमि पर मालिकाना हक पाने के लिये दर-दर की ठोकरें खा रहे है। कहने को तो जिस 60 एकड़ भूमि में ये 25 परिवार अपना दावा प्रस्तुत कर रहे है वह दावा ग्राम सभा की पहली ही बैठक में मान्य कर लिया गया था परन्तु डिण्डौरी जिले के मेंहदवानी विकासखण्ड के ग्राम ढोकरघाट के ग्रामीणों ने भी इस भूमि पर अपना दावा जता दिया था जिसके कारण भूमि का मालिकाना हक अब तक किसी को नहीं मिल पाया है। ग्रामीणों की माने तो जिस भूमि पर दावा किया जा रहा है वह मण्डला जिले के अंतर्गत आती है और उस भूमि पर बसगढ़ी गांव के लोग ही वर्षो से खेती करते चले आ रहे थे परन्तु जब से वनाधिकार का यह दावा प्रस्तुत किया गया है तब से लेकर अब 10 साल बीतने के बाद भी इन 25 आदिवासी परिवारों को जमींन का मालिकाना हक नहीं मिल पाया है। प्रशासनिक अधिकारी भी पिछले 10 सालों से फाइलें यहां से वहां घुमा रहे है पर निराकरण करने की पहल किसी ने भी नहीं की है।
इन्हें नहीं मिला हक
ग्राम पंचायत हिरनाछापर के ग्राम बसगढ़ी में 25 आदिवासी परिवार 60 एकड़ भूमि पर मालिकाना हक की मांग कर रहे है इनमें से 15 परिवार बैगा जनजाति के है परन्तु इनकी सुनवाई करने वाला अब तक कोई सामने नहीं आया है। बसगढ़ी के चमरसिंह पिता मेहरूसिंह, सियाराम पिता तीरथसिंह, गेंदसिंह पिता कोपासिंह, मूलचंद पिता छोटेलाल, कुंवर लाल पिता मोहन लाल, राजाराम पिता ढोलीराम, चूरामन पिता सुमारू सिंह, गोविन्द सिंह पिता झगनू सिंह, कमलसिंह पिता पनकू सिंह, छोटेलाल पिता मुलैया, रतनसिंह पिता लोहरमन, कमल सिंह पिता धनुआसिंह, छोटेलाल पिता मुलैया, कालूराम पिता रन्नूसिंह, ब्रम्हासिंह पिता माहूसिंह, हरिलाल पिता सिद्धू, देवसिंह पिता गंगाराम, बाबूलाल पिता परमा, तीजा बाई पति गनपत, सुखदीन पिता प्रेमलाल, महासिंह पिता जानूसिंह, बसोरी सिंह पिता चेतासिंह, जुगराज पिता खुमान, रूपसिंह पिता पंचम सिंह, संजय कुमार पिता दसैया, गुहैया बाई पति सुकलीसिंह उन 25 परिवारों के मुखिया हैं जो पिछले 10 वर्षो से इस वन भूमि का मालिकाना हक मांग रहे है।

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