बिझौली की मढिय़ा में भरती है सूनी गोद

सदियों से आस्था का केन्द्र है कल्चुरकालीन पाषाण मूर्ति

By: Mangal Singh Thakur

Published: 22 Jul 2021, 08:16 PM IST

मंडला. नि:संतान दंपत्ती संतान सुख पाने के लिये हरसंभव प्रयास करते हैं फिर चाहे चिकित्सकीय उपचार हो या कोई धार्मिक अनुष्ठान, जिले के निवास तहसील के समीप ग्राम बिझौली में नगरार नदी के तट पर प्राकृतिक सौंदर्य के बीच बिझौली की मढिय़ा हजारों श्रृद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र हैं क्योंकि यह वह प्रसिद्ध देवस्थान है जहां माता बिरासनी की कल्चूरीकालीन पाषाण की मूर्ति स्थापित है। यहां की मान्यता है कि नि:संतान दंपत्ती द्वारा सच्ची श्रृद्धा से प्रार्थना करने पर संतान सुख की प्राप्ति होती है। इस मढिय़ा की महत्ता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां डिंडौरी, जबलपुर, बालाघाट, सिवनी आदि अनेक जिलों से नि:संतान दंपत्ती संतान प्राप्ति की कामना से अर्जी लगाने आ चुके हैं और मन्नत पूरी होने पर चैत्र नवरात्र में जवारे बोकर कलश स्थापना करते है। इन जवारों की संख्या इतनी अधिक होती है कि मढिय़ा के भीतर का पूरा क्षेत्र जवारों से भर जाता है। यहां मंदिर प्रांगण में मुख्य प्रतिमा के अलावा कल्चुरीकालीन अनेक मूर्तियां स्थापित हैं जो कि बिझौली ग्राम में ही मकान आदि बनाने के लिए गड्ढे किए जाने के दौरान मिली। इनको ग्रामवासियों ने मंदिर प्रांगण में लाकर स्थापित कर दी हैं। यहां राधाकृष्ण सांई बाबा, नर्मदा माता, शिव, गणेश, सीताराम, हनुमान, शनिदेव आदि के भी सुंदर मंदिर हैं। भले ही वर्तमान में यहां भव्य मंदिर का निर्माण करा दिया गया है। लेकिन अब भी इस देवस्थान को छप्पर वाली खपरैल वाली मढिय़ा ही कहा जाता है। यहां की देखरेख क्षेत्रीय दुर्गा समिति द्वारा की जाती है। यह क्षेत्र नर्मदा पथ परिक्रमा मार्ग पर भी पड़ता है अत: परिक्रमा वासियों का जमावड़ा यहां लगा रहता है जिनके भोजन आदि की व्यवस्था ग्रामीणों के द्वारा ही की जाती है।

Mangal Singh Thakur
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