scriptAlong with existence, national human beings are also fighting diseases | अस्तित्व के साथ बीमारियों से भी लड़ रहे राष्ट्रीय मानव | Patrika News

अस्तित्व के साथ बीमारियों से भी लड़ रहे राष्ट्रीय मानव

रिसर्च में बात आई सामने

मंडला

Published: April 04, 2022 12:52:15 pm

मंडला. संरक्षित बैगा जनजाति जिन्हें राष्ट्रीय मानव की संज्ञा दी गई है। इन्हें जड़ी-बूटियों की पहचान और उपयोग की क्षमता के चलते प्राकृतिक वैद्य माना जाता है, लेकिन प्रशासनिक अनदेखी के चलते यह वर्ग मौजूदा समय में कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहा है। हालात ये हैं कि बैगा जनजाति बाहुल्य जिले मंडला के दूरदराज के गांवो में आदिवासी हाइपरटेंशन, त्चचा रोग समेत टीबी और रक्त की कमी से होने वाली समस्याओं का सामना कर रहे हैं। जानकारी अनुसार इसका खुलासा आइसीएमएआर जबलपुर के रिसर्च फैलो द्वारा की गई शुरुआती रिसर्च में हुआ है। इसके पहले एम्स भोपाल द्वारा किए गए भ्रमण में भी ये समस्याएं सामने आई थीं। बताया गया कि बैगा जनजाति के लोग पूरी तरह आज भी प्रकृति पर निर्भर हैं, लेकिन पहले जैसा प्राकृतिक परिवेश इन बैगाओं को नहीं मिल रहा है। पर्याप्त पोषण आहार नहीं मिलने से बैगा परिवार के कई सदस्य तरह-तरह की बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं। कई बैगा परिवार के सदस्य हाइपरटेंशन के शिकार होने की बात सामने आई है। इसके अलावा बड़ी संख्या में बच्चे सहित युवा और बुजुर्ग त्वचा संबंधी रोगों से ग्रसित हैं। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में बीमारियां लगातार बढ़ रही हैं। बता दें कि मप्र में बैगा आदिवासियों की बड़ी आबादी डिंडौरी और मंडला जिले के दूरदराज के गांवों में रहती है। ये वन उपज पर निर्भर रहते हैं। जानकारी अनुसार आइसीएमआर जबलपुर ने वर्ष 1987-88 में भी इन क्षेत्रों में सर्वे कराया था। उस दौरान भी बैगा आदिवासियों में त्वचा संबंधी बीमारियां सामने आई थीं। हालांकि उस समय हाइपरटेंशन की समस्या नहीं थी। बैगा आदिम जनजाति समाज विकास एवं कल्याण संघ मप्र के प्रदेश संरक्षक नंदराम बैगा ने बताया कि जिले में लगातार राष्ट्रीय बैगा परिवारों की संख्या कम होती जा रही है। इस संबंध में स्थानीय प्रशासन से लेकर प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, राज्यपाल तक को पत्राचार कर जरूरी पहल करने की मांग की गई है। नंदराम ने बताया कि दरअसल जिन्हें राष्ट्रीय मानव कहा कहा गया है, जो शासन की प्रथम योजनाओं के असली हकदार हैं, वे अन्य जनजातियों में गुम हो गए हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि कुछ अन्य जनजातियां जैसे भील, सहारिया, धगरिया, आंद, नगरची, कोले आदि भी अपने आपको को बैगा बताने लगे हैं, इसी के चलते जो मुख्य बैगा परिवार हैं, वे शासन की योजनाओं के लाभ से वंचित हो रहे हैं। नंदराम बैगा ने बताया कि बैगा जनजाति के लोग अधिक मेहनती काम करते हैं, जिसके चलते इनके द्वारा ऐसा भोजन किया जाता है जिससे उन्हें अधिक समय तक उर्जा मिले। वन क्षेत्रों में निवास करने वाले बैगा जनजाति के लोग भोजन में अपेक्षाकृत पेज जो मक्का, बाजरा से बनाया जाता है उपयोग करते हैं जिसे और अधिक स्वादिष्ट बनाने के लिए इनके द्वारा नमक का उपयोग अधिक मात्रा में किया जाता है, और यही नमक का अधिक उपयोग ही इन्हें हाईपर टेंशन का मरीज बना रहा है।
स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव
मंडला जिले के दूरास्थ वनांचलों में रहने वाले बैगा आदिवासी दूषित पेजयल और बेहतर हाइजीन नहीं होने की वजह से त्वचा रोग के शिकार हुए हैं। इसी के साथ वनांचलों में प्रारंभिक स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलने से रोग लगातार बढ़ रहा है। यहां अधिकतर जगह पर शुद्ध पेजयल नहीं है। ग्रामीण पुराने कुओं और गहरे गड्ड्डो से निकलने वाले पानी का उपयेाग करते हैं। इसी तरह भोजन में पर्याप्त पोषण नहीं मिलने और नमक का अधिक उपयोग करने से बड़ी आबादी हाइपरटेंशन का शिकार है। इससे लकवा जैसी समस्या आम है। चावल, रोटी से दूरी बैगा जनजाति के लोगों द्वारा आमतौर पर चावल, रोटी का उपयोग नहीं किया जाता है, ये इसे मीठा अनाज मानते हैं। राशन से जो अनाज इन्हें मिलता है कई परिवार इसे बेचकर अपनी अन्य जरूरतें पूरी करते हैं। इसी के साथ इनका मानना है कि ये जल्द पच जाते हैं जिससे उन्हें बार-बार भोजन की जरूरत महसूस होती हैं, लेकिन उन्हें ऐसा करना पसंद नहीं है जिसके चलते ये राष्ट्रीय मानव बैगा परिवार के लोग मक्का, बाजारा का अधिक उपयोग करते हैं क्योंकि इसे भोजन के रूप में लेने से चावल, रोटी की जगह लंबे समय तक भोजन की जरूरत महसूस ही नहीं होती है और वे अधिक समय तक अपने खेत-खलियानों में पसीना बहा सकते हैं। नंद राम बैगा के अनुसार राष्ट्रीय मानव बैगा परिवारों में बीमारियों का मुख्य कारण दूषित पेजयल का उपयोग के साथ ही पर्याप्त पोषण न मिलना, हाइजीन की व्यवस्था नहीं होना, प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त स्टाफ की कमी, शासन से मिले राशन का उपयोग भोजन के रूप में नहीं करना, प्रोटीन आधारित खाद्य सामग्री की कमी आदि कारण शामिल हैं।

अस्तित्व के साथ बीमारियों से भी लड़ रहे राष्ट्रीय मानव
अस्तित्व के साथ बीमारियों से भी लड़ रहे राष्ट्रीय मानव

सबसे लोकप्रिय

शानदार खबरें

Newsletters

epatrikaGet the daily edition

Follow Us

epatrikaepatrikaepatrikaepatrikaepatrika

Download Partika Apps

epatrikaepatrika

Trending Stories

नाम ज्योतिष: ससुराल वालों के लिए बेहद लकी साबित होती हैं इन अक्षर के नाम वाली लड़कियांभारतीय WWE स्टार Veer Mahaan मार खाने के बाद बौखलाए, कहा- 'शेर क्या करेगा किसी को नहीं पता'ज्योतिष अनुसार रोज सुबह इन 5 कार्यों को करने से धन की देवी मां लक्ष्मी होती हैं प्रसन्नइन राशि वालों पर देवी-देवताओं की मानी जाती है विशेष कृपा, भाग्य का भरपूर मिलता है साथअगर ठान लें तो धन कुबेर बन सकते हैं इन नाम के लोग, जानें क्या कहती है ज्योतिषIron and steel market: लोहा इस्पात बाजार में फिर से गिरावट शुरू5 बल्लेबाज जिन्होंने इंटरनेशनल क्रिकेट में 1 ओवर में 6 चौके जड़ेनोट गिनने में लगीं कई मशीनें..नोट ढ़ोते-ढ़ोते छूटे पुलिस के पसीने, जानिए कहां मिला नोटों का ढेर

बड़ी खबरें

अब तक 11 देशों में मंकीपॉक्स : शुक्रवार को WHO की इमरजेंसी मीटिंग, भारत में अलर्ट, अफ्रीकी वैज्ञानिक हैरानओबीसी आरक्षण: जिला पंचायत 30, जनपद 20 और सरपंचों को 26 फीसदी आरक्षणThailand Open: PV Sindhu ने वर्ल्ड की नंबर 1 खिलाड़ी Akane Yamaguchi को हराकर सेमीफाइनल में बनाई जगहसुप्रीम कोर्ट में अपने लास्ट डे पर बोले जस्टिस एलएन राव- 'जज साधु-संन्यासी नहीं होते, हम पर भी होता है काम का दबाव'ज्ञानवापी मस्जिद केसः सुप्रीम कोर्ट का सुझाव, मामला जिला जज के पास भेजा जाए, सभी पक्षों के हित सुरक्षित रखे जाएंIPL 2022 RR vs CSK: चेन्नई को हरा टॉप 2 में पहुंची राजस्थानIPL 2022 Point Table: गुजरात और राजस्थान ने प्लेऑफ में टॉप 2 में जगह की पक्की, आरसीबी-मुंबई दिल्ली भरोसेशिक्षा मंत्री की बेटी को कलकत्ता हाई कोर्ट ने दिए बर्खास्त करने के निर्देश, लौटाना होगा 41 महीने का वेतन
Copyright © 2021 Patrika Group. All Rights Reserved.