गांव में खाली बैठने से अच्छा बाहर मिर्ची तोड़ें

पलायन बनी मजबूरी, ग्राम पंचायत स्तर पर नहीं मिल रहा काम

By: Mangal Singh Thakur

Published: 22 Jan 2021, 11:58 AM IST

मंडला. गांव में खाली बैठने से अच्छा है साहब की बाहर जाकर मिर्ची तोड़ लें, परिवार के एक सदस्य को काम मिलता तो चार सदस्य बैठे रहते हैं। होली का त्यौहार के कुछ माह है इसके बाद नवरात्री और फिर शादी विवाह का सीजन शुरू हो जाएगा। किसी को घर के बच्चों की शादी करवानी है तो किसी को रिश्तेदारों के यहां शादी में भी सहयोग करना है। जिसके लिए काफी पैसे की आवश्यकता पड़ेगी। गांव में इतना काम नहीं मिल पा रहा है कि पैसे जोड़ सकें। काम मिल भी गया तो समय पर पैसे मिल जाएंगे इसकी गारंटी भी नहीं रहती है।

इसलिए गांव और जिला छोड़कर परिवार के साथ बाहर काम में जा रहे हैं। यह कहना बबलिया के समीप सड़क पर बस के आने का इंतजार करते मजदूरों का है। जिनकी किस्मत में शायद पलायन ही लिखा है। ग्रामीणों की माने तो शासन प्रशासन के बड़े-बड़े वादे की बीच फिर से पलायन ने रफ्तार पकड़ ली है। जिसे महानगरों की ओर जाने वाले यात्री वाहनों में भी साफ देखा जा सकता है। रायपुर, नागपुर जबलपुर की और जाने वाले बसों में पलायन करने वाले मजदूरों की संख्या अधिक है। गांव में रोजगार दिलाने की जिला प्रशासन की कवायद भी फेल होते नजर आ रही है। रबी के बोवनी के बाद ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में मजदूर पलायन कर रहे हैं। कोरोना काल में विभिन्न समस्याओं से अपने घर लौटे मजदूरों को मनरेगा से काफी उम्मीद थी की उन्हें उनके गांव और जिले में की काम मिल जाएगा। लेकिन जमीनी स्तर पर मनरेगा के तहत काम ही स्वीकृत नहीं हो रहे हैं। वहीं वर्षों से निर्माणधीन काम भी मूल्यांकन ना होने से अटके हुए हैं। ग्राम पंचायतों में जॉब कार्ड तो बनाए गए हैं लेकिन परिवार के एक ही सदस्य को काम मिलता है शेष सदस्य खाली बैठे हैं वह भी साल भर में 100 दिन काम से परिवार को भरण पोषण करना मुश्किल हो रहा है।

नहीं काम आया श्रम सिद्ध अभियान
कोरोना संकट और लॉक डाउन के बीच प्रदेश सरकार ने श्रम सिद्धि अभियान शुरू किया था। इसके तहत हर मजदूर को काम दिया जाना था। अभियान के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्र में हर व्यक्ति को कार्य दिया जाने का लक्ष्य था। इसके लिए घर-घर सर्वे किया गया जिनके पास जॉब कार्ड नहीं थे उनके जॉब कार्ड बनाए गए। जो मजदूर अकुशल हैं उन्हें मनरेगा में कार्य दिलाया गया। जिले में 18 हजार 309 मजदूरों को मनरेगा के तहत रोजगार उपलब्ध कराया गया। जबकि अप्रैल माह तक जिले में 30 हजार 552 प्रवासी मजदूरों की वापसी हुई थी। जिसमें 24 हजार 186 मजदूरों के पहले से जॉब कार्ड थे। वहीं 3 हजार 230 मजदूरों के नये जाब कार्ड बनाए गए। ग्राम पंचायतों में काम तो खोला गया है लेकिन प्रवासी मजदूरों को प्राथमिकता नहीं दी गई। खेती किसानी वाले मजदूरों को मनरेगा में काम दिलाया जा रहा है। जिसके चलते प्रवासी मजदूर फिर से पलायन करने लगे हैं।


केस 01- नागपुर के लिए लिए रवाना
नैनपुर. रोजगार की कमी के चलते मजदूरों का पलायन प्रतिदिन जारी हो गया है। इन दिनों खेतिहर मजदूर और छोटे किसानों के पास काम नहीं है। गांवों में महानगरों से दलाल आकर मजदूरों को ले जा रहे हैं। जनपद पंचायत नैनपुर के आलम यह है कि जनपद सदस्य खुद ठेकेदारी कर रहे हैं। जो निर्धारित कार्य को बाहर के ठेकेदारों को मोटी रकम लेकर बाहर के मजदूरों व मशीनों के माध्यम से काम कराकर पंचायत के मजदूरों का शोषण व हक छीन रहे हैं। नैनपुर की ग्राम पंचायत तिन्दुआ बम्हनी के मजदूरों का कहना है कि पंचायत में कोई रोजगार नहीं मिल रहा है कुछ दिनों पंचायत में काम किया था तो उसका भुगतान नहीं हो पा रहा है। पूर्व वर्षों में भी किए गए कार्यों का भुगतान भी नहीं मिला है। जिले में रोजी-रोटी के कोई साधन नहीं है। पेट पालने हमें मजबूरी में घर परिवार को छोड़कर नागपुर जाना पड़ रहा है।


केस 02 - मिर्ची तोडऩे आंध्रप्रदेश निकले सैंकड़ो मजदूर
बबलिया. मकर संक्रांति के बाद निवास विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत नारायणगंज विकासखंड के मजदूर आंध्रप्रदेश तिल्लांगना शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। ग्राम सिमरिया के रोशन सिंह कुलस्ते, गौमति कुलस्ते, अनिल कुलस्ते आदि अनेक लोगो ने बताया कि हमें क्षेत्र में दैनिक मजदूरी नहीं मिलती। इसलिए हम पलायन कर रहे हैं। ग्राम रानटोला ग्राम पंचायत बनार के 20 मजदूर, केरीवाह के 35 महिला पुरूष, कछार टोला सांरंटोला मेहदवानी से 43 महिला पुरूष, ग्राम पंचायत बरबटी के ग्राम गाड़ा देवरी से 15 मजदूर, कटंग सिवनी से 20 महिला पुरूष, ग्राम पंचायत शाहा बनोची से 7 महिला पुरूष, ग्राम सुखरी निवास से 10 महिला पुरूष काम की तलाश में आंध्रप्रदेश रवाना हो चुके हैं। वहां ये मजदूर मिर्ची तोडऩे का काम करेंगे। हाल में दो लगजरी बसों में लगभग 200 मजदूरों ने पलायन किया है। मजदूरों का कहना है कि कि ग्राम पंचायतों में पर्याप्त काम नहीं मिल पा रहा है। इसलिए पलायन मजबूरी बन गई है। ग्राम पंचायत में रोजगार गारंटी के तहत कार्य चल रहा है। लेकिन परिवार के एक ही सदस्य को काम मिल पता है।

इनका कहना है.
पंचायत में काम नहीं मिलने के कारण नागपुर जा रहे हैं। वर्ष 2017 के काम का पैसा नहीं मिला है। अब नया काम करने के बाद पैसे की उम्मीद नहीं बची है। जिसके चलते मेरे साथ ही गांव के दर्जनो लोग पलायन कर रहे हैं।
विस्सु लाल उईके, तिंदुआ बम्हनी

इस साल कुछ दिन ही जॉब कार्ड के माध्यम से काम मिला जिसका कुछ भुगतान भी शेष है। लगभग 15 दिन काम किए हैं लेकिन इतने काम से परिवार को भरण पोषण मुश्किल हो रहा है। आगामी माह में विवाह आदि के लिए पैसे की जरूरत होगी। जिसके लिए बाहर काम करने जा रहे हैं।
राजेश वरकड़े, तिंदुआ बम्हनी

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