scriptChatuamar village could not become open defecation free | खुले में शौच मुक्त नहीं हो सका चटुआमार गांव | Patrika News

खुले में शौच मुक्त नहीं हो सका चटुआमार गांव

गांव में आज भी खुले में शौच करने को मजबूर है ग्रामीण

मंडला

Published: April 29, 2022 05:11:36 pm

मंडला. आधे अधूरे शौचालय के कारण जिला मुख्यालय का समीपी चटुआमार ग्राम आज भी खुले से शौच मुक्त नहीं हो सका है। शौचालय तो हितग्राहियों के लिए स्वीकृत कर दिए हैं लेकिन पर्याप्त राशि ना मिलने के कारण पूर्ण नहीं कर पाए। गांव में दो दर्जन से ज्यादा परिवारों के पास आज भी शौचालय नहीं है। विभाग की ओर से शौचालय बनाने के लिए मिल रही सहायता राशि बहुत कम है। ग्रामीणों का कहना है कि मात्र 12 हजार रुपये में शौचालय नहीं बनाया जा सकता है। ग्राम पंचायत चटुआमार में आज भी गांव में पिछड़ेपन की झलक साफ नजर आती है। गांव में बड़ी तादाद में लोग खुले में शौच जाते हैं। आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण गरीब परिवार शौचालय का निर्माण नहीं करा पा रहे हैं। पंचायत के माध्यम से मनरेगा के अंतर्गत वंचित परिवारों को शौचालय बनाकर देने की योजना चलाई जा रही है। इसके लिए 12 हजार रुपए का बजट दिया जा रहा है। लेकिन इतने बजट में ग्रामीणों को शौचालय बनाना मुश्किल हो रहा है। स्वच्छ भारत मिशन में जैसे शहरी शौचालयों के हाल है उससे कमतर ग्रामीण इलाकों के होंगे। यहां भी पिछले छह साल से हितग्राहियों को शहर से कम 12 हजार रुपए दिए जा रहे हैं। इस अनुदान राशि से शौचालय बनाना मुश्किल हो रहा हैं क्योंकि रेत, सीमेंट, गिट्टी और ईंट के दाम पहले की तुलना में दोगुने हो गए हैं। सरकार ने ग्रामीण शौचालयों की राशि में भी वृद्धि नहीं की है। इससे पंचायतों में शौचालयों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
शौचालय निर्माण के भुगतान में पेंच
शौचालय निर्माण के प्रति लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए 12 हजार रुपए दिया जाता है। ग्राम पंचायत प्रतिनिधि शौचालय निर्माण के भुगतान के लिए पहले घर-घर जाकर भौतिक सत्यापन करते हैं। कई लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने शौचालय बना लिया, लेकिन उनका भुगतान नहीं किया गया है। कुछ लोग पुराना शौचालय दिखाकर भुगतान लेना चाहते हैं।
महंगाई के वजह से आज भी अधूरा पड़ा शौचालय
ग्रामीणों का कहना है कि शौचालय बनाने की लागत कम से कम 25 हजार रुपए करनी चाहिए ताकि अच्छे से शौचालय का निर्माण किया जा सके। पिछले 5 साल पहले भी रेत ईंट गिट्टी के दाम 7 से 8 हजार रुपए था और आज वर्तमान में 10 से 11 हजार रुपए की है। सरकारी द्वारा मात्रा 12 हजार रुपए दिया जा रहा है। इससे आधा अधूरा शौचालय बन कर ही रहेगा। कई गांवों में अधूरा पड़ा शौचालय स्वच्छ भारत के सपने की खिल्ली उड़ा रहा है। किसी शौचालय में सीट नहीं है तो किसी का छत खुला तो किसी का टैंक बनना बाकी है। जिस कारण लोग आज भी खुले में शौच जाने को मजबूर हैं।
आज भी नही बढ़ी शौचालय की अनुदान राशि
आज भी सरकार ने शहरी व ग्राम पंचायतों के घरेलू शौचालय का अनुदान नहीं बढ़ाया है। उस पर 12 फीसदी जीएसटी काटने का प्रावधान अलग कर दिया है। मैदानी में लागत ज्यादा आने से निर्माण एजेंसियों को मुश्किल जा रही है तो वहीं गुणवत्ता अलग प्रभावित हो रही है। जानकारी के अनुसार वर्ष 2012 से स्वच्छ भारत मिशन के तहत घरेलू शौचालयों के निर्माण शुरू कराए गए थे। उस समय एक घरेलू शौचालय की लागत 12600 रुपए दी गई थी। इसके बाद वर्ष 2013 में इस लागत को 13600 रुपए किया गया। तब से ही इसी दर पर अनुदान मिल रहा है। जबकि छह साल बाद एक शौचालय की लागत कम से कम 25 हजार रुपए होना चाहिए। इस दौरान सीमेंट, रेत, गिट्टी और ईट के दाम लगभग दोगुना होने की स्थिति में आ गए। लागत वृद्धि के लिए समय-समय पर केन्द्र और राज्य सरकार का ध्यान भी दिलाया गया। अभी तक इस लागत दर को परिवर्तित नहीं किया गया है। इससे निर्माण एजेंसियां मुश्किल से काम कर रही है। निर्माण में 12 फीसदी जीएसटी काटने से 13 हजार 600 रुपए की राशि करीब 12 हजार रुपए हो जाती है। इसके चलते किसी भी हितग्राही का शौचालय गुणवत्ता युक्त नहीं बन पाता। साल-दो साल में क्षतिग्रस्त होने लगता है। जबकि एक साधारण घर में लोग शौचालय बनवाते हैं तो उन्हें 25 हजार रुपए से अधिक लागत आती है।
इनका कहना -
सरकार द्वारा 12 हजार की राशि दी गई लेकिन 12 हजार की राशि में सिर्फ रेत, ईंट ही आ पाया, स्वयं से अपनी फसल बेचकर कर 10 हजार रुपए लगाकर शौचालय का निर्माण कराई हूं। हमारे गांव में कई जगह तो आधा अधूरा शौचालय बना हुआ है।
रामती बाई सोनीवानी, ग्रामीण
शौचालय तो है लेकिन पानी की सुविधा नहीं है। जिसके कारण खुले मौसम में बाहर जाकर ही लोग शौच कर रहे हैं। गांव में पर्याप्त पानी की सुविधा मिलने लगे तो लोगों को बाहर शौच में ना जाना पड़े।
कमलेश मरकाम, ग्रामीण
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