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आज देवउठनी एकादशी पर जागेंगे भगवान

तुलसी पूजा के बाद बजेगी शहनाई

मंडला

Published: November 15, 2021 09:27:43 pm

आज देवउठनी एकादशी पर जागेंगे भगवान
मंडला. देवताओं के जागने के बाद मंगल-आयोजनों का दौर आरंभ हो जाएगा। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को लोग देवउठनी एकादशी के नाम से जानते हैं। मान्यता है कि क्षीर सागर में चार महीने की योगनिद्रा के बाद भगवान विष्णु इस दिन उठते हैं। इस बार देवउठनी एकादशी आज 15 नवंबर को पड़ रही है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी देवउठनी या देवोत्थान एकादशी पर श्री विष्णु की पूरे विधि-विधान से पूजा की जाती है।
धर्मग्रंथों के अनुसार, भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु ने दैत्य शंखासुर को मारा था। भगवान विष्णु और दैत्य शंखासुर के बीच युद्ध लम्बे समय तक चलता रहा। युद्ध समाप्त होने के बाद भगवान विष्णु बहुत अधिक थक गए। तब वे क्षीरसागर में आकर सो गए और कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागे। तब सभी देवी-देवताओं द्वारा भगवान विष्णु का पूजन किया गया। इसी वजह से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को देवप्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है।
एक बार फिर शहनाई बजेगी। सोमवार को तुलसी-सालिगराम विवाह के साथ शुरू होने वाले शुभ मुहूर्त 13 दिसंबर तक रहेंगे। इस दौरान 10 शुभ मुहूर्त हैं, जिसमें नवंबर में छह और दिसंबर में चार हैं। शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में देव उठनी एकादशी के लिए तैयारियां हो चुकी है। देव उठने के साथ ही शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाएगी। देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना होगी।

तुलसी विवाह की परंपरा:
देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह की भी परंपरा है। भगवान शालिग्राम के साथ तुलसीजी का विवाह होता है। इसके पीछे एक पौराणिक कथा है, जिसमें जालंधर को हराने के लिए भगवान विष्णु ने वृंदा नामक विष्णु भक्त के साथ छल किया था। इसके बाद वृंदा ने विष्णु जी को श्राप देकर पत्थर का बना दिया था, लेकिन लक्ष्मी माता की विनती के बाद उन्हें वापस सही करके सती हो गई थीं। उनकी राख से ही तुलसी के पौधे का जन्म हुआ और उनके साथ शालिग्राम के विवाह का चलन शुरू हुआ।
पूजा का विशेष लाभ:
देवश्यनी एकादशी के बाद से सभी शुभ कार्य बंद हो जाते हैं, जो की देवउठनी एकादशी पर ही आकर फिर से शुरू होते हैं। इन चार महीनों के दौरान ही दिवाली मनाई जाती है, जिसमें भगवान विष्णु के बिना ही मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। लेकिन देवउठनी एकादशी को भगवान विष्णुजी के जागने के बाद देवी-देवता भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की एक साथ पूजा करके देव दिवाली मनाते हैं। देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से परिवार पर भगवान की विशेष कृपा बनी रहती है। इसके साथ ही मां लक्ष्मी घर पर सदैव धन, संपदा और वैभव की वर्षा करती हैं।
गन्ने से होती है पूजा :
देवउठनी एकादसी के दिन जब देवों को जगाया जाता है तो पूजा अर्चना में गन्ने का उपयोग किया जाता है। गन्ने से ही मंडप बनाया जाता है और उसके नीचे ही देवताओं की पूजा अर्चना की जाती है। एकादसी की पूजन के लिये एक दिन पहले ही गन्ने से पूरा शहर भरा पड़ा रहा। लोग पूजन के लिये गन्ना ले गए।
आज देवउठनी एकादशी पर जागेंगे भगवान
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