कान्हा पार्क की टूटी फेंसिंग से बढ़ा सेंधमारी का खतरा

वन्य प्राणी और फसल दोनो खतरे में

By: Mangal Singh Thakur

Updated: 02 Aug 2020, 06:44 PM IST

मंगल सिंह

मंडला। कान्हा नेशनल पार्क की सुरक्षा व्यवस्था पर टूटी फेंसिंग ने सेंध लगा दी है। इससे न केवल पार्क के वन्य प्राणियों पर खतरा मंडराने लगा है बल्कि क्षेत्र के किसानों की फसल भी खतरे में पड़ गई है क्योंकि वन्य प्राणी टूटी फेंसिंग के जरिए किसानों के खेत में प्रवेश करके उनकी फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं। फसल का नुकसान देखकर कई बार किसान आक्रोशित हो जाते हैं, वन्य प्राणियों को नुकसान पहुंचा देते हैं और जाने अंजाने वन्य अपराध के आरोपी बन जाते हैं। दरअसल कान्हा नेशनल पार्क से लगे ग्रामों की सुरक्षा के लिए कुछ वर्ष पूूर्व फेंसिंग कराई गई थी। जिसमें समय समय पर सुरक्षा की दृष्टि से सोलर ऊर्जा के माध्यम से हल्के करंट के झटके भी दिए जाते थे। ताकी वन्य जीव जंगल से निकल कर रहवासी क्षेत्र में ना पहुंच सकें। लेकिन खटिया गेट के पास पिछले दो सालों से फेंसिंग क्षतिग्रस्त पड़ी हुई। इससे न केवल स्थानीय किसान, उनके खेत की फसल और साथ ही वन्य प्राणियों की सुरक्षा पर प्रश्न चिन्ह लग गया है।
खतरे में वन्यप्राणी
कान्हा नेशनल पार्क के कोर जोन के सात रेंज व बफर जोन के 6 रेंज के अंतर्गत लगभग 170 गांव आते हैं। जहां निवासरत लगभग एक लाख की आबादी वन उत्पादों के साथ खेती पर निर्भर है। कान्हा के जंगल से बाहर निकलकर चीतल, संभार, नील गाय, वनसूकर, वायसन आदि किसानों की फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं। जिससे वन जीव की सुरक्षा भी खतरे में है। इन वन्य प्राणियों को शिकारियों द्वारा नुकसान पहुंचाया जा सकता है। सुरक्षा की दृष्टि से कान्हा प्रबंधन द्वारा कान्हा से लगे ग्रामों के आसपास जो फेंसिंग कराई गई थी।वह रखरखाब के अभाव में क्षतिग्रस्त हो गई है। इससे ग्रामीण भी चोरी छिपे वन उत्पाद लेने जंगल में प्रवेश कर रहे हैं। जिससे जंगली जीव, फसल व ग्रामीण सभी खतरे में हैं।
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122 कैंप से होती है निगरानी
बारिश के मौसम में कान्हा नेशनल पार्क बंद रहता है। इस समय चोरी छिपे जंगल में संदिग्धों का प्रवेश भी शुरू हो जाता है। शिकार की घटनाओं को रोकने के लिए यह मौसम बहुत महत्वपूर्ण होता है। प्रबंधन से मिली जानकारी के अनुसार, कान्हा क्षेत्र के अंतर्गत 122 स्थाई कैंप बनाए गए हैं। जहां फॉरेस्ट गार्ड व चौकीदार रहते हैं और निर्धारित क्षेत्र में गश्ती करते हैं। स्थाई कैंप में चौकीदारों को सीमित सुविधाओं के बीच निवास करना पड़ रहा है। बताया गया है कि वहांं बिजली व पानी की सुविधा भी नहीं है। कान्हा प्रबंधन का कहना है कि जल्द ही सभी कैंप में सोलर पैनल के माध्यम से बिजली उपलब्ध कराने पर कार्य किया जाएगा। शिकार की संभावना उजली रात में अधिक रहती है। इस समय में कान्हा की टीम में सतर्क रहती है।
लाठी के सहारे गश्त
बफर व कोर एरिया में नियमित फारेस्ट गार्ड द्वारा गश्ती की जाती है। जिन्हें हर दिन 50 से 80 किलोमीटर पैदल गश्त करना होता है। हाईटेक समय में भी उनके पास खतरनाक वन्यप्राणियों से सुरक्षा के लिए लाठी का सहारा रहता है। गश्ती पर नजर एम.एसटीआरईईएस मोबाइल एप के माध्यम से रखी जाती है। जो गश्ती शुरू के दौरान अपनी लोकेशन व अन्य जानकारी ऑफ लाइन एप में डालते हैं। एप के माध्यम से उच्च अधिकारी भी पता लगा सकते हैं कि किस क्षेत्र में गश्ती हुई है और किसने कितने किलोमीटर गश्ती की है। यह डाटा सप्ताह में डाउनलोड किया जाता है।
वर्जन
मानसून के दौरान सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। पेट्रोलिंग लगातार जारी है। वर्तमान में शिकार के कोई मामले सामने नहीं आए हैं। जहां फेंसिंग क्षतिग्रस्त हुई है, वहां गर्मी के सीजन में नये स्तर से फेंसिंग कराई जाएगी।
एल कृष्णमूर्ति, क्षेत्र संचालक, कान्हा टाइगर रिजर्व, मंडला।

Mangal Singh Thakur
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