कम मेहनत में सुरक्षित रहेगा पौधा

इस विधि से करेंगे पौध रोपण तो रोज-रोज की सिंचाई से मिलेगी निजात

By: shivmangal singh

Published: 24 Jul 2018, 08:46 PM IST

मंडला. वृक्ष लगाना पुण्य का कार्य है। शास्त्रों में वृक्षों को धर्मपुत्र कहा गया है। पेड़ सेवक भी हैं, रक्षक भी हैं और अभिभावक भी हैं। वृक्षारोपण से दैहिक, दैविक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार के लाभ होते हैं। इसी उदï्देश्य से 'पत्रिकाÓ द्वारा हरित प्रदेश अभियान चलाया जा रहा है। जिसमें बड़ी संख्या में लोग सहभागी बन रहे हैं। ईको क्लब प्रभारी राजेश क्षत्री ने बताया कि पौध रोपण के बाद नियमिति सिंचाई की आवश्कता होती है। लेकिन कुछ व्यस्तता के चलते सिंचाई करना भूल जाते हैं साथ ही जहां सिंचाई की व्यवस्था नहीं है वहां पौधों की सुरक्षा के लिए मटका थिम्बक पद्धति से कारगर साबित हो सकती है। इसके लिए एक पुराना मटका लें। उसमें एक छेद करें तथा उसमें जुट की रस्सी डालकर पौधे के पास गाड़ दें और मटके को पानी से भर दें। एक बाल्टी पानी मटके में भरने से पांच दिन तक पौधे में पानी देने की आवश्यकता नहीं होगी। उन्होंने कहा कि अन्य पौधों की तुलना में मटके से सिंचाई की व्यवस्था वाला पौधा जल्दी बढ़ता है। पिछले दिन संभाग आयुक्त ने मवई में पौधरोपण किया था वहां मटका थिम्बक पद्धिति का प्रयोग किया गया। क्षत्री का कहना है कि मटका थिम्बक पद्धति से पौधों को पानी देने में पानी और समय के साथ मेहनत भी बचती है। कटरा छात्रावास में प्रवेशोत्सव के दौरान अतिथियों ने मटका थिम्बक पद्धति का ही उपयोग किया है। पौधारोपण के समय ही इसका इस्तेमाल करने से पौधे के बड़े होने तक लगातार इसका उपयोग किया जा सकता है।
पानी के साथ समय की बचत
बहुत ही कम संसाधन और सरल सी इस तकनीक के अपनाने से ही पौधे का विकास भी तेजी से होता है। इसके जरिए फलों और सब्जियों की खेती भी की जा सकती है। इसमें सबसे कम मात्रा में पानी की खपत होती है यानी पानी की ज्यादा-से-ज्यादा बचत की जा सकती है। यह एक ऐसी सरल-सहज और बिना पैसों की तकनीक है, जिससे कम पानी में भी पौधा जीवित रह सकता है और पानी का भी अपव्यय नहीं होता है। अब प्रशासन भी इस पर जोर दे रहा है। इसे अब प्रदेश के विभिन्न जिलों में अपनाया जा रहा है। इसके लिये जरूरी सामग्री जैसे पुराना मटका और जूट की रस्सी गाँवों में आसानी से उपलब्ध हो जाती है। अमूमन परिवारों में हर साल गर्मियों के दौरान घर का मटका बदला ही जाता है। नए मटके में पीने का पानी रखें और पुराना मटका पौधों के लिए इस्तेमाल करें।
क्षत्री ने बताया कि दरअसल पौधा रोपते समय जो गड्ढा खोदा जाता है, उसी गड्ढे में कुछ दूरी पर कोई पुराना मटका रख देते हैं और मटके की तली में एक छेद किया जाता है। इस छेद से होकर जूट की रस्सी पौधे की जड़ों तक पहुँचाई जाती है। अब पौधा रोपने के बाद मटके के निचले हिस्से को भी पौधे की जड़ों की तरह खोदी गई मिट्टी से ढँक दिया जाता है। गड्ढा भरने के लिये मिट्टी, रेत और गोबर खाद बराबर-बराबर लेना चाहिए। यह ध्यान रखा जाता है कि मटके का मुँह खुला रहे। चाहें तो धूप या प्रदूषण से बचाने के लिये इसे कपड़े से ढँका भी जा सकता है। इससे फायदा यह होगा कि आप एक बार मटके को पानी से भर देंगे तो अगले पांच दिनों तक पौधे को पानी देने की जरूरत नहीं होगी। मटके की तली में लगी जूट की रस्सी बूंद-बूंद कर टपकते हुए पौधे की जड़ों तक पानी पहुंचाती रहेगी। जैसे-जैसे पौधा पानी लेता रहेगा, वैस-वैसे मटके में पानी कम होता जाएगा। इस तरह तो पानी, समय और मेहनत की बचत होगी वहीं दूसरी तरफ पौधे की बढऩे की गति भी तेज रहेगी।

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