तो इसलिए ढूंढने से नहीं मिलता नीलकंठ

तो इसलिए ढूंढने से नहीं मिलता नीलकंठ

Mangal Singh Thakur | Publish: Oct, 09 2019 07:34:45 PM (IST) | Updated: Oct, 09 2019 07:34:46 PM (IST) Mandla, Mandla, Madhya Pradesh, India

भारतीय संस्कृति का शुभ का प्रतीक नीलकंठ लुप्त होने के कगार में

मंडला. विजयादशमी के दिन नीलकंठ के दर्शन करना भारतीय सनातन संस्कृति में शुभ माना गया है। यही कारण है कि मंगलवार को शहर के लोग आसपास ग्रामीण क्षेत्रों में घुमते नजर आए। कुछ लोगों को नीलकंठ दिख गया तो कुछ लोगों को नीराश लौटना पड़ा। भारतीय सनातन संस्कृति का शुक का प्रतीक मानने वाले पक्षी नीलकंठ आज लुप्त होने के कगार में है। हर परंपरा और त्योहार इनके दर्शन के बगैर अधूरा है। इनके दर्शन पाकर हर व्यक्ति अपने आप को खुशनसीब मानने लगता है कि यह वर्ष उसके लिए हितकारी होगा। नीलकंठ जिसे इंडियन रोलर वल्र्ड या ब्लूजय के नाम से जाना जाता है। यह एक भारतीय पक्षी है जो उष्णकटिबंधीय दक्षिण एशिया से ईरान व थाईलैंड तक पाया जाता है। इसकी चौक भारी होती है वक्षस्थल अधूरा होता है वही उधर तथा पुचका अद्भुत नीला होता है पंख पर गहरे और धूमिल नीले रंग के भाग उड़ान के समय में चमकीले पटिया के रूप में दिखाई देता है। सर के ऊपर का हिस्सा पंख और पूंछ का रंग नीला होता है। यह पक्षी अक्सर खेतों में बिजली के तारों में वह नदियों के किनारे वृक्षों में बैठे पाए जाते हैं। सनातन धर्म में नीलकंठ को शुभ माना जाता है क्योंकि भगवान शिव को भी नीलकंठ कहा जाता है इसी कारण से इसे प्रतीकात्मक रूप के कारण नीलकंठ के दर्शन का आधार धार्मिक महत्तव को यह बढ़ाता है। भारत में बिहार, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और उड़ीसा राज्य के सरकारों ने राज्य पक्षी के रूप में इसे घोषित किया है। आज यह पक्षी भी दुर्लभ माना जा रहा है क्योंकि धीरे-धीरे यह लुप्त होने के कगार में है। किसान लगातार अपनी फसलों में रसायनिक खाद व कीटनाशक का प्रयोग अपने खेतों में कर रहा है जिसके कारण खेतों में पाए जाने वाले कीट पतंगों को खाकर यह विषैले कीटों के भोजन के कारण यह तेजी से मर रहे हैं और धीरे-धीरे लुप्त होने के कगार में है। यह पक्षी किसानों के मित्र भी कहा जाता है क्योंकि यह फसल की बढ़ोतरी में किसानों की मदद करता है। एकांत प्रिय पक्षी किसानों के फसलों में पढऩे वाले कीड़े, खेतों में झींगा कीटों को खा लेते हैं। इस कारण किसान का मित्र कहा जाता है। आरके क्षत्री प्रभारी पर्यावरण क्लब ने कहा है कि आज इन पक्षियों का संरक्षण करने की अत्यधिक आवश्यकता है। किसानों को विषैले कीटनाशक एवं रसायनिक खादों का प्रयोग कम से कम करना चाहिए। जैविक खाद व जैविक कीटनाशक का प्रयोग लिए उन्हें जागरूक करने की आवश्यकता है। नीलकंठ जैसे पक्षी मंडला शहर के पास ही मानादेही, सुरंग देवरी, सहस्त्र धारा, रानी पार्क कटरा में अत्यधिक रूप से पाए जाते हैं। इन्हे नीलकंठ बफर जोन घोषित किए जाने की जरूरत है। विद्यालय में पढ़ रहे विद्यार्थियों को इको क्लब क्लब के छात्रों को नीलकंठ के संरक्षण के प्रयास करने चाहिए। ताकि प्रकृति रक्षक और हमारी सनातन संस्कृति के इन धरोहरों की हम रक्षा कर सकें।

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