गुड़ तक सिमटी गन्ने की पैदावार, टूट रहे किसान

खांडसारी मिल बंद होने से टूटे किसान, विकास कार्यक्रम शुरू करने की मांग

By: Mangal Singh Thakur

Updated: 11 Jan 2021, 02:26 PM IST

मंडला. जिला पहले गन्ने की खेती के लिए प्रसिद्ध हुआ करता था लेकिन जिले में संचालित दो खाण्डसारी सुगर मिल के बंद होने के बाद इसका दायरा सीमित क्षेत्रों तक सिमट कर रह गया। गन्ने की खेती क्षेत्र में अब गिने चुने गांवों में ही हो रही है। जिसका कारण सरकार द्वारा किसानों को गन्ने की फसल के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाना है। लागत अधिक व फायदा कम होने के चलते क्षेत्र के किसानों का इस खेती से प्रत्येक साल मोह भंग होता जा रहा है। अगर समय रहते सरकार द्वारा कोई प्रोत्साहन नीति नहीं बनाई गई तो आने वाले कुछ वर्षों में इसकी खेती इतिहास के पन्नों में सिमट जाएगी। सरकारी आंकड़े अनुसार जिले में करीब 33 सौ हेक्टेयर में गन्ने की फसल लगाई जा रही है।
जिले के गन्ना उत्पादक किसान मिल बंद होने से टूट गए है जो किसान गन्ना की फसल ले रहे हैं, वह गन्ना सिर्फ गुड़ बनाने के काम आ रहा है। इससे किसानो को कोई ज्यादा फायदा होने वाला नहीं है। अब किसान फिर से सुगर मिल खोलने की मांग भी कर रहे है। गन्ना उत्पादक किसानो का कहना है कि मंडला में गन्ना फसल का उत्पादन बढ़ाने के लिए शासन स्तर से गन्ना विकास कार्यक्रम संचालित किया जाए। जिसका फायदा यहां के करीब 33 सौ हैक्टेयर भूमि में गन्ना लगाने वाले किसानो को मिल सके।
बताया गया है कि मंडला में गन्ना उत्पादन को देखते हुये यहां रायपुर रोड में दो खाण्डसारी मिल संचालित थी, लेकिन उपेक्षा के शिकार गन्ना किसान बिना कार्यक्रम के इसकी पैदावार नहीं बढ़ा पाए। हर साल दस से बारह टन उत्पादन रहा है। इस बीच किसानो का रूझान गुड़ बनाने की तरफ बढ़ गया। जिसके चलते मिल में पर्याप्त गन्ना नहीं पहुंच पाया। लगातार घाटे में चल रही खाण्डसारी मिल को मलिक ने बंद कर दिया है। इसके बाद जो गन्ना मिल में करीब 240 रुपए प्रति क्ंिवटल में बेचा जाता था। अब गुड़ बनाने वाले व बिचौलिया इसे कम कीमत में ले रहे हैं। इससे किसानो को नुकसान झेलना पड़ रहा है।


जिले के बाहर जाता है गुड़
बताया गया है कि गन्ना उत्पादक किसान के कुछ समूह गन्ना से गुड़ बनाने का काम करते है। शेष किसानो से गन्ना खरीदा जाता है। मंडी में विक्रय के बाद मंडला का यह गुड़ बिहार, छत्तीसगढ़ के साथ प्रदेश के सतना कटनी, जबलपुर समेत अन्य जिलो में सप्लाई किया जाता है। जहां मंडला के गुड़ की अधिक मांग है। अभी कृषि मंडी में गुड़ की कम आवक होने के कारण कम गुड विक्रय किया जा रहा है। गुड़ से किसानों को पर्याप्त मुनाफा नहीं मिल रहा है वहीं गुड़ बनाने की प्रक्रिया में मजदूर और समय भी अधिक लगता है।
किसानों का कहना है कि गन्ने की खेती का दायरा दिन प्रतिदिन सिमटता जा रहा है। विगत वर्षो पहले क्षेत्र के पुरवा, सकवाह, रामबाग, कौरगांव, हिरदेनगर, पदमी, सेमरखापा, भपसा, पीपरपानी, मुगदरा, धनौरा, करियागांव समेत आसपास के ग्रामों में गन्ने की खेती वृहद पैमाने पर की जाती थी। अब किसान गेहूं, धान की परंपारिक खेती कर रहे हैं। नगदी फसल से उनका मोह भंग हो रहा है।
किसानों का कहना है कि गन्ना की फसल इसलिए भी फायदे मंद क्योंकि इसे एक बार बोने के बाद तीन साल तक काटते हैं। फसल तैयार होने में लगभग एक साल का समय लग जाता है, बुआई के समय कुल लागत खर्च प्रति एकड़ करीब 8 हजार रुपए आता है।


इनका कहना है
मंडला में खाण्डसारी मिल बंद हो जाने के कारण गन्ना उत्पादक किसानो को उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। गुड़ के लिए गन्ना क्रय करने वाले समूह को कम दामो में गन्ना बेचना पड़ रहा है। जिससे किसानो को नुकसान हो रहा है।
श्रीराम सिंधिया, भारतीय किसान संघ अध्यक्ष

हम अब गुड़ बनाकर मंडी में बेच रहे हैं, लेकिन मेहनत के मुताबिक गुड़ बेचने पर फायदा नहीं हो रहा है। जिसके कारण गन्ने की फसल अब कम कर दी है। गन्ने का रकबा करीब आधा हो गया है, अन्य फसलों को प्राथमिकता दे रहे है।
चंद्रकुमार कछवाहा, गुरार मोहल्ला, कौरगांव

मंडला का गुड़ प्रदेश के बाहर भी अपनी मिठास के लिए प्रसिद्घ है। गन्ना की खेती नगद खेती कहलाती है जिसके चलते यहां का गन्ना का रकबा अच्छा था, अचानक मिल बंद हो जाने से जिले में खाण्डसारी का उत्पादन बंद हो गया। गुड़ बनाने मजबूर है।
कृष्णा बाई कछवाहा, पीपरपानी

गन्ने की फसल तो इस बार अच्छी हुई थी, लेकिन फसल के गिर जाने के कारण गन्ने टूट गया, जिसके कारण हमें नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन गुड़ बनाने में मेहनत के मुताबिक दाम उचित नहीं मिल पाता है। सरकार को योजना बनाना चाहिए।
लक्ष्मीबाई भांवरे, रमगढ़ी, चिरईडोंगरी

गुड़ बनाकर मंडी में बेचा जाता है, यहां जिले के बाहर के व्यापारी गुड़ खरीदी करते हैं, जिसके कारण बाहर भी जिले के गुड़ की मांग अधिक है, लेकिन उचित दाम ना मिलने के कारण किसानों का रूझान गन्ने की फसल से हटता जा रहा है।
सुशील कछवाहा, कौरगांव, पुरवा

Mangal Singh Thakur
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