Children’s Day 2017: चाचा नेहरू के सपने को साकार कर रहीं मथुरा की शिखा

शिखा बंसल सड़क गरीब बच्चों के लिए स्कूल चलाती हैं। वे फैशन डिजाइनिंग इंस्टीट्यूट में बतौर फैकल्टी काम कर रहीं हैं।

By: suchita mishra

Published: 14 Nov 2017, 03:28 PM IST

मथुरा। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन की तिथि यानी 14 नवंबर को देश में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। नेहरू के जन्मदिन को बाल दिवस घोषित करने के पीछे दो मुख्य कारण थे, पहला पंडित नेहरू बच्चों से बेहद प्यार करते थे और दूसरा, वे हमेशा से उनकी शिक्षा को लेकर बेहद संवेदनशील थे। वे बच्चों को देश का भविष्य मानते थे। इसलिए उनके जन्मदिन को बच्चों को समर्पित किया गया। इसे मनाने के पीछे मूल उद्देश्य बच्चों को शिक्षा के प्रति जागरूक करना है।

बच्चों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने भी राइट टू एजूकेशन के तहत सभी बच्चों के लिए शिक्षा को अनिवार्य किया है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि राइट टू एजूकेशन देश में महज दलीलों का एक हिस्सा बनकर रह गया है। धरातल पर हकीकत आज भी कुछ और ही है।
आज भी तमाम बच्चे पढ़ाई के बजाय बाल मजदूरी करने को मजबूर हैं। ऐसे बच्चों को साक्षर बनाने का जिम्मा लिया है, मथुरा की शिखा बंसल ने। फैशन डिजाइनिंग इंस्टीट्यूट में बतौर फैकल्टी काम कर रहीं शिखा अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर सड़क पर गरीब बच्चों की पाठशाला चला रही हैं। साथ ही चाचा नेहरू के सपने को साकार करने में अहम योगदान दे रही हैं।

 

Children’s Day 2017

सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की औपचारिकता मात्र
इस बारे में शिखा बताती हैं कि सरकार ने बेशक सभी बच्चों को पढ़ाने के लिए राइट टू एजूकेशन कानून बना दिया हो, लेकिन सच्चाई ये है कि आज भी कई बच्चे या तो अशिक्षित हैं या फिर अगर किसी सरकारी स्कूल में जाते भी हैं तो वहां पढ़ाई का कोई माहौल नहीं होता। यानी उनका पढ़ना या न पढ़ना एक बराबर ही है। ऐसे बच्चों को सही दिशा में आगे बढ़ाने के लिए हमने सड़क पर ही बच्चों को शिक्षित करना शुरू किया। उनकी टीम में कुल छह लोग हैं।

तीन महीने में 75 बच्चे
शिखा का कहना है कि इस काम को शुरू किए उन्हें सिर्फ तीन महीने ही हुए हैं लेकिन उनके पास करीब 75 बच्चे आ चुके हैं और लगातार ये संख्या बढ़ती ही जा रही है। बड़े और छोटे बच्चों का अलग अलग सेशन बना रखा है, जिसके मुताबिक सभी को अलग अलग पढ़ाया जाता है। उन्होंने बताया कि वे और उनके अन्य सभी साथी कामकाजी हैं। इसलिए सभी अपने अपने कामों से शाम पांच बजे फ्री हो पाते हैं। उसके बाद साढे पांच बजे तक यहां बच्चों को पढ़ाने आते हैं।

सोसाइटी से मिलती मदद
शिखा का कहना है कि इस नेक काम में उनकी मदद उनकी सोसाइटी के लोग भी कर रहे हैं। सोसाइटी के लोग उन्हें आर्थिक मदद देते हैं जिससे बच्चों की पाठ्य सामग्री आती है।

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