ढ़प बाजौ रे छैल मतवारे कौ...

— महाप्रभु जी की जन्मभूमि में हुरंगा के साथ फाग महोत्सव संपन्न।

By: arun rawat

Published: 03 Apr 2021, 05:49 PM IST

पत्रिका न्यूज़ नेटवर्क
मथुरा। ब्रज में अनादिकाल से ही होली के बाद हुरंगा की परंपरागत चली आ रही है जगह-जगह पर प्राचीन हुरंगा का भव्य आयोजन समूचे ब्रज मंडल में किया जाता है। इसी क्रम में शुक्रवार के दिन श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु जी की प्राकट्य स्थली श्रीजी मंदिर बाद ग्राम में प्राचीन परंपरागत चले आ रहे हुरंगा का आयोजन बड़ा रासमण्डल के महंत लाड़िली शरण महाराज के सान्निध्य में किया गया। जिसमें सुबह से ही श्रीकृष्ण वट पर होरी की धमार एवं तारा महल में वृन्दावन से आए समाजियों द्वारा समाज गायन बधाई गायन के साथ सखियों ने अष्ट सखियों के समक्ष अपने आराध्य को रिझाने के लिए मनमोहक नृत्य प्रस्तुत किया। महंत लाड़िली शरण ने कहा कि ब्रज में बसंत पंचमी से शुरू होने वाले चालीस दिवसीय फाग महोत्सव का विश्राम ब्रज की होली एवं हुरंगा के साथ रंग पंचमी के दिन किया जाता है। ब्रज में चलने वाले चालीस दिवसीय फाग महोत्सव का आनंद लेने के लिए देश-विदेशों से भारी संख्या में श्रद्धालु ब्रज मंडल के फाग महोत्सव में यहां आकर सम्मिलित होते हैं।

वहीं महाप्रभु जी की जन्मभूमि (श्रीजी मंदिर) के महंत दम्पति शरण महाराज ने कहा कि प्राचीन हुरंगा के दिन महाप्रभु जी की जन्मभूमि में श्रीकृष्ण वट पर होरी की धमार होती है।वृन्दावन से आए समाजियों द्वारा समाज गायन, बधाई गायन के पदों के साथ हरिनाम संकीर्तन में श्रद्धालु झूमते हुए रंग पंचमी के दिन होरी व हुरंगा का जमकर आनंद लेते हैं। प्राचीन हुरंगा में हुरियारिनें-हुरियारों पर जमकर प्रेम पगी लाठियां बरसाती हैं। हुरियारे ब्रज के रसिया सुनाकर हुरियारिनों के साथ ब्रज के प्राचीन हुरंगा का आनंद लेते हैं जिसे देख दूरदराज से आए श्रद्धालु भी झूम उठते हैं। ऐसी अनूठी परंपरा आपको तीन लोक से न्यारी नगरी ब्रज मंडल में ही देखने को मिलेगी।

इस मौके पर महंत हरिशंकर दास महाराज, महंत लाड़िली शरण महाराज, महंत फूलडोल दास महाराज, महंत रामस्वरूप दास महाराज, पुरूषोत्तम दास महाराज, बाबा नागरी दास, राधाबल्लभ बाबा, ब्रजेश पुजारी, नारायण पुजारी, खेलन मुखिया, राधाबल्लभ पंडित, मदन पंडित, बालो भगत, बिहारी सिंह, कल्याण लंबरदार, बालो पंडित, मीडिया प्रभारी दिनेश सिंह तरकर, व्यास नंदन आदि लोग मुख्य रूप से मौजूद रहे।


By - निर्मल राजपूत

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