संजीवनी से कम नहीं गोबर से गोवर्धन पूजन, जानिए इसके वैज्ञानिक महत्व

संजीवनी से कम नहीं गोबर से गोवर्धन पूजन, जानिए इसके वैज्ञानिक महत्व

Sanjay Kumar Sharma | Publish: Nov, 08 2018 12:57:52 PM (IST) Meerut, Meerut, Uttar Pradesh, India

देशभर में आठ नवंबर 2018 को मनाया जा रहा गोवर्धन पर्व

मेरठ। भारतीय संस्कृति में पूजा-पाठ और त्योहारों के वैज्ञानिक महत्व भी छिपे हुए हैं। जो लोग भारतीय त्योहारों को रूढ़िवादी परंपरा और उनको दकियानूसी की संज्ञा देते हैं, उन्हें इन पर्वों के वैज्ञानिक महत्व को भी जानना चाहिए। गोवर्धन पूजन के दिन सभी के मन में एक जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि गोवर्धन पूजा में गोबर को प्रयोग क्यों किया जाता है। गोबर से ही क्यों गोवर्धन पर्वत को बनाया जाता है।दरअसल, वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर गोवर्धन का मतलब होता है गो संवर्धन। यानी गाय का संवर्धन।

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गोवर्धन का यह है वैज्ञनिक महत्व

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बारिश के दिनों में या बारिश होने के बाद विभिन्न रोगों को जन्म देने वाले कीड़े-मकोड़े और बैक्टीरिया पैदा हो जाते हैं। गोबर एक ऐसा जबरदस्त एंटी बैक्टीरियल तत्व है जो गांव देहात में इन कीड़े-मकोड़ों को तो मार ही देता है साथ ही यह विभिन्न रोगों के कारक बैक्टिरियां को भी खत्म करता है। गांव और घर के आगन में गोबर की लिपाई-पुताई से इन सबका खात्मा हो जाता है। पहले कच्चे घरों की गोबर से लिपाई होती थी और घर के आंगन में चौका लगाया जाता था। गाय के गोबर से बैक्टीरिया मर जाते हैं। गोमूत्र आयुर्वेदिक दवाओं में काम आता है। इन सब कारणों से भी गोवर्धन की पूजा की जाती है। इसी कारण गोवर्धन के दिन गोबर से ही गोवर्धन पर्वत और श्रीकृष्ण बनाए जाते हैं। घर के आंगन में बनाने से घर में शुद्धता आती है और हानिकारक बैक्टीरिया का सफाया होता है। गोवर्धन की पूजा इसीलिए गोबर से करने का प्रावधान है।

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गाय के गोबर को रेडियम किरणें भी पार नहीं

गोवर्धन यानी गायों का संवर्धन। इसी से जुड़ा हुआ है गोवर्धन पूजा का त्योहार। यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि गाय के गोबर से जहां लिपाई-पुताई हो जाती है, तो फिर उस जगह से रेडियम किरणें पार नहीं हो सकती। गाय के दूध और गोमूत्र में से स्वर्ण भी निकलता है, यह भी वैज्ञानिकों ने साबित कर दिया है। पुराने समय में तो ग्रामीण क्षेत्र के ग्वालों को गोवर्धन पूजा के दिन विशेष सम्मान दिया जाता था। मेरठ कालेज के भूगोल के रिटायर्ड प्रोफेसर डा. कंचन सिंह कहते हैं कि ये भारतीयों के लिए किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं है। इसलिए हम भारतीय को अपनी पुरातन भारतीय संस्कृति से जुड़े रहने की जरूरत है।

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