इस खिलाड़ी पर बनी फिल्म तो कहीं टिक नहीं पाएगी दंगल

इस खिलाड़ी पर बनी फिल्म तो कहीं टिक नहीं पाएगी दंगल
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यूपी की एक ऐसी खिलाड़ी है जिसने गीता फोगाट से ज्यादा संघर्ष कर पदक झटके

नोएडा: बीते शुक्रवार को आमिर खान की फिल्म 'दंगल' रिलीज हो चुकी है। फेसबुक से लेकर ट्विटर और तमाम सोशल मीडिया साइट्स पर गीता फोगाट ट्रेंड कर रही हैं। वहीं एक और खिलाड़ी का नाम भी है जो गीता फोगाट से कहीं आगे थीं। जो इंडियन कुश्ती को गीता फोगट के मुकाबले कहीं आगे लेकर गई। अगर उन्हें ओलंपिक में चांस मिलता तो महिला कुश्ती में ओलंपिक में गोल्ड मेडल का सूखा कब का खत्म हो चुका होता। उस महिला पहलवान का नाम है अलका तोमर। जिन्होंने गीता से पहले कुश्ती करियर की शुरूआत की और ग्रामीण इलाके में रहने के बाद भी अपना एक अलग मुकाम हासिल किया। आइये जानते हैं उनके बारे में।

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पिता ने बेटों की तरह पाला

अलका तोमर बताती हैं कि मेरे पिता को कुश्ती का काफी शौक था और वो खुद भी कुश्ती करते थे। उन्होंने भी बेटे में ही कुश्ती के मेडल का सपना देखा था। मेरे भाई ने कुश्ती भी की लेकिन जहां तक पहुंचना चाहिए था वहां तक नहीं पहुंच सका। लेकिन मेरे पिता ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने मुझे कुश्ती में डाला। जब मैं दस साल की थी तभी से पिता नैन सिंह तोमर ने मुझे कुश्ती के लिए तैयार करना शुरू कर दिया। उन्होंने मुझे भी उसी माहौल में पाला जिस माहौल में मेरे दोनों भाई थे। उन्होंने मुझमें और दोनों भाईयों में कोई फर्क नहीं रखा। कुश्ती के लिए उन्होंने मेरे बाल ब्वॉयकट करा दिए थे। उसके बाद मेरी जर्नी शुरू हुई।

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इस कुश्ती कोच का मिला साथ

मेरे पिता ने अपने दोस्त और कुश्ती कोच जबर सिंह के पास भेजना शुरू कर दिया। शुरूआत में तो जबर सिंह भी थोड़े असमंजस में दिखे। अलका बताती हैं कि जब मैं उनके पास गई थी तो उनके पास एक भी महिला पहलवान नहीं थी। वो काफी कंफ्यूज थे कि आखिर इस लडक़ी को कैसे सिखाएंगे? किस तरह से प्रैक्टिस कराएंगे? अलका बताती हैं कि पहले तो उन्होंने हल्का फुल्का बताना शुरू किया। जब उन्होंने मुझमें फुर्ती देखी और मेरे खेलने का तरीका देखा तो उन्होंने मुझे सीरियस लेना शुरू कर दिया। फिर क्या था कुछ समय में मैं उनकी सबसे फेवरेट स्टूडेंट्स में से एक हो गई थी।

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भाई ने साथ जाने से कर दिया था इनकार

कुश्ती प्रेक्टिस के लिए मुझे अपने गुरुजी के पास जाना पड़ता था। मेरे साथ मेरे परिवार का कोई ना कोई जरूर होता था। लेकिन मेेरे भाई ने मेरे साथ जाने से मना कर दिया था। उसे अजीब लगता था उसकी बहन कुश्ती के लिए जा रही है। सभी लोग बड़े ही अजीब तरीके से देखते थे। भाई के मना करने के बाद मेरे पिता ही सामने आए और वो भी मुझे गुरुजी के पास लेकर जाने लगे। अलका ने बताया कि मुझे मेरे पिता स्कूल के दौरान हर तरह के स्पोट्र्स में भाग लेने को कहते थे। मैंने स्कूल में कई स्पोट्र्स में ट्रॉफी जीती हुई हैं। मेरे पिता रोज मुझे दौड़ाया करते थे। उन्होंने मेरे साथ काफी मेहनत की।

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गांव में गुजरते ही मिलते थे ताने

अलका तोमर ने बताया जब मैं कुश्ती के लिए घर से निकलती थी तो आसपास के लोग कहते थे कि ये लडक़ी क्या पहलवानी करेगी? पहलवानी लड़कों के लिए होती है। इस लड़की का क्या होगा? अजीब-अजीब बातें होती थी। पिता ने दिल और दिमाग में कुश्ती में नाम कमाने का और देश के लिए मेडल जीतने का ऐसा जज्बा भर दिया था कि उसके अलावा कुछ और सूझता ही नहीं था। सुबह छह बजे चले जाना और शाम को आना। सिर्फ कुश्ती पर फोकस रहता था। मेरे पिता और मेरा एक मकसद बन गया था कि कुश्ती में नाम कमाना। उसके अलावा हम दोनों को न तो कुछ सुनाई देता था और ना ही कुछ दिखाई देता था। इसलिए कुछ समय के बाद सब सामान्य सा लगने लगा। आज वो ही लोग मेरा और मेरे परिवार का नाम गर्व से लेते हैं। उन्हीं लोगों को अब लगता है कि वो अपनी बेटियों स्पोट्र्स में आगे बढ़ाएं।

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अन्याय ने रोकी राह

अलका तोमर का एक सपना जो अधुरा रह गया वो है ओलंपिक में देश को गोल्ड मेडल दिलाने का सपना। जो वो लंदन ओलंपिक में पूरा का सकती है। लेकिन सेलेक्शन ट्रायल का विवाद उसमें हुई राजनीति की वजह से उन्हें लंदन जाने मौका नहीं मिल सका। जानकारों की मानें तो ओलंपिक में महिला रेस्लिंग में गोल्ड मेडल का सूखा लंदन में ही पूरा हो जाता। अलका उस समय बेहतरीन फॉर्म में होने के साथ वल्र्ड रेस्लिंग की सबसे बेहतरीन पहलवानों में से एक थी। जिसके बाद तो उन्होंने सन्यास ही ले लिया।

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यूं ही नहीं मिला गोल्डन गर्ल का खिताब

अलका तोमर को देश के लिए यूं ही खास नहीं बोला जाता है। उन्हें देश में महिला रेस्लिंग में गोल्डन गर्ल के रूप में भी जाना जाता है। उन्होंने सबसे पहले देश को 55 किलो वर्ग में दोहा एशियन गेम्स में ब्रांज मेडल दिलाया। उसी साल उन्होंने च्वांगझू में हुए सीनियर रेस्लिंग चैंपियनशिप में ब्रांज मेडल जीता। जिसके बाद उन्हें भारत सरकार की ओर से अर्जुन अवॉर्ड से नवाजा गया। 2018 में उन्होंने अपना वेट कैटेगिरी बढ़ाते हुए 59 किलोग्राम में गोल्ड मेडल जीता। अगर बात कॉमनवेल्थ रेस्लिंग चैंपियनशिप की बात करें तो लगातार तीन बार केपटाउन 2005, जालंधर 2009 और मेलबर्न 2011 के खेलों में लगातार गोल्ड मेडल जीता था।

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गीता से ज्यादा संघर्षपूर्ण है मेरी कहानी


दंगल पर बात करते हुए उन्होंने कहा फिल्म काफी अच्छी है। जब उनसे पूछा गया किया अगर आप पर फिल्म बने तो वो कैसी होगी? उन्होंने हंसते जवाब दिया कि गीता से ज्यादा संघर्षपूर्ण कहानी होगी अलका की। उन्होंने 1997 की दिल्ली में हुए सब जूनियर नेशनल का मैच याद करते हुए बताया कि मैच जीत जाने के बाद उन्हें ओवर ऐज बताकर बाहर कर दिया गया था। मैंने जो संघर्ष किया उतना गीता को नहीं करना पड़ा।
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