scriptLaxmikant Vajpayee tribute to former cm Kalyan Singh | Kalyan Singh के करीबी लक्ष्मीकांत वाजपेयी बोले- पिछड़ा होने के बावजूद इसलिए उन्हें मिलते थे सभी जाति के वोट | Patrika News

Kalyan Singh के करीबी लक्ष्मीकांत वाजपेयी बोले- पिछड़ा होने के बावजूद इसलिए उन्हें मिलते थे सभी जाति के वोट

पूर्व प्रदेशाध्यक्ष डाॅ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने कहा- सख्त, ईमानदार और कुशल प्रशासक के तौर पर जाना जाएगा कल्याण सिंह का शासनकाल।

मेरठ

Published: August 22, 2021 05:12:03 pm

मेरठ. दिन था 30 अक्टूबर सन था 1990 का और प्रदेश के मुख्यमंत्री थे मुलायम सिंह यादव। वही मुलायम सिंह यादव जिन्होंने इस दिन यूपी के मुख्यमंत्री रहते हुए अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाने का हुक्म दिया और नतीजतन इस गोलीकांड में कई कारसेवकों की मौत हो गई। मुलायम सिंह सरकार में हुआ ये गोली कांड भाजपा के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। भाजपा ने मुलायम सिंह से मुकाबला करने के लिए कल्याण सिंह को आगे किया। कल्याण सिंह ने भी अपनी काबिलियत को साबित किया और महज़ एक साल में भाजपा को उस स्थिति में ला दिया कि पार्टी ने 1991 में पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली।
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कल्याण सिंह के नजदीकी रहे पूर्व प्रदेशाध्यक्ष डाॅ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी कहते हैं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद कल्याण सिंह ने अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों के साथ अयोध्या का दौरा किया और राम मंदिर का निर्माण करने के लिए शपथ ली थी। उसके बाद से उनकी इमेज एक राम भक्त के रूप में बनती चली गई। मेरठ कैंट के पूर्व विधायक अमित अग्रवाल का कहना है कि कल्याण सिंह का पहला कार्यकाल सिर्फ़ बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए ही नहीं, बल्कि एक सख़्त, ईमानदार और कुशल प्रशासक के तौर पर भी याद किया जाता है।
डाॅ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी कहते हैं कि कल्याण सिंह ने ही पहली बार हिंदुत्व की राजनीति को परवान चढ़ाया, वो ईमानदार नेता थे। पिछड़ा वर्ग से थे, लेकिन उन्हें हर जाति का वोट मिलता था। बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना उनके कार्यकाल की निस्संदेह एक बड़ी घटना थी, लेकिन क़रीब डेढ़ साल का उनका कार्यकाल एक सख़्त प्रशासक के तौर पर याद किया जाता है।
कल्याण सिंह का नकल अध्यादेश था उस दौरान का बड़ा फैसला

डाॅ. लक्ष्मीकांत कहते हैं कि कल्याण सिंह के कार्यकाल में नक़ल अध्यादेश एक बड़ा फ़ैसला था, जिसकी वजह से सरकार के ख़िलाफ़ नाराज़गी भी बढ़ी। लेकिन, बोर्ड परीक्षाओं में पहली बार नक़लविहीन परीक्षाएं हुईं। समूह 'ग' की भर्तियों में बेहद पारदर्शिता बरती गई और कल्याण सिंह का यह कार्यकाल उनकी ईमानदारी के लिए भी याद रखा जाता है।

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