चैंपियन महिला पहलवानों के इस कोच की फाइल इसलिए नहीं बढ़ पाती, क्योंकि सिफारिश नहीं है

चैंपियन महिला पहलवानों के इस कोच की फाइल इसलिए नहीं बढ़ पाती, क्योंकि सिफारिश नहीं है
jabar singh som

sandeep tomar | Publish: Dec, 30 2016 04:14:00 PM (IST) Noida, Uttar Pradesh, India

मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय परिसर के कुश्ती प्रशिक्षण केंद्र में 35-40 महिला पहलवान लगातार प्रैक्टिस में जुटी रहती हैं

मेरठ। मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय परिसर के कुश्ती प्रशिक्षण केंद्र में 35-40 महिला पहलवान लगातार प्रैक्टिस में जुटी रहती हैं। इसी केंद्र ने देश को पहली एशियाई गेम्स कांस्य विजेता पहलवान दी। यहीं से कामनवेल्थ गेम्स समेत कई इंटरनेशनल इवेंट की चैंपियन महिला पहलवान निकलीं। दुर्भाग्य ये है कि इस केंद्र को पिछले दो दशक से चला रहे कोच को द्रोणाचार्य बनाने की फाइल हर बार इसलिए अटक जाती है, क्योंकि उनके पास सिफारिश नहीं है।

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नौसिखिया लड़कियों को चैंपियन बनाया

ये कोच हैं जबर सिंह सोम। उन्होंने सुबह और शाम लगातार इस केंद्र में लड़कियों को कुश्ती के दांव पेंच सिखाते देखा जा सकता है। उनके केंद्र में आने वाली लड़कियां आमतौर पर नौसिखिया होती हैं, जो महिला कुश्ती में आकर करियर तो बनाना चाहती हैं लेकिन वास्तविक तौर पर उन्हें इस खेल का कोई कुछ नहीं आता। ऐसी तमाम लड़कियां आज कह सकती हैं कि जबर सिंह ने उन्हें तराश कर इंटरनेशनल महिला पहलवान बना दिया। एशियाई गेम्स में दो बार पदक विजेता, कामनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक विजेता अलका तोमर जब यहां आईं तो उन्हें कुश्ती में कुछ नहीं आता था। अब उनकी अपनी पहचान है। वह अर्जुन अवार्ड भी हासिल कर चुकी हैं

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केंद्र को मिल चुके हैं 40 से ज्यादा इंटरनेशनल पदक

कोच जबर सिंह बताते हैं कि उनके केंद्र में ट्रेनिंग कर रही महिला पहलवान पिछले डेढ़ दशकों में 40 से ज्यादा इंटरनेशनल पदक जीत चुकी हैं। नेशनल प्रतियोगिताओं की गिनती करें तो पदकों की संख्या कहीं ज्यादा होगी। लेकिन कुश्ती के इस कोच का एक दर्द भी है। उनका कहना है कि पिछले चार पांच सालों से कुश्ती फेडरेशन लगातार उन्हें दोणाचार्य करने की सिफारिश कर फाइल खेल मंत्रालय भेजता है लेकिन वहां हर बार उनकी फाइल वहीं की वहीं अटक जाती है।

क्योंकि नहीं है सिफारिश

आमतौर पर एशियाई गेम्स और कामनवेल्थ गेम्स में पदक जीतने वाले कोचों को आराम से द्रोणाचार्य अवार्ड मिल जाता है। कई ऐसे कोचों को भी इस अवार्ड से नवाजा जा चुका है, जिनकी उपलब्धियां इससे भी कम रही हैं। इस लिहाज से देखें कोच जबर सिंह सोम न केवल इस अवार्ड के हकदार हैं। आखिर पांच साल से कुश्ती फेडरेशन की सिफारिश के बाद भी खेल मंत्रालय का अवार्ड पैनल उनके नाम पर विचार क्यों नहीं कर रहा तो जवाब में वह कहते हैं कि मेरे पास कोई सिफारिश नहीं है। अगर ऐसा होता तो मैं कभी का द्रोणाचार्य अवार्ड पा चुका होता। आखिर मुझको बताया जाए कि इसके लिए मुझमें कौन सी कमी है।

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अब निराश हो चले हैं जबर

महिला कुश्ती के क्षेत्र में जबर देश के तीन चार ऐसे कोचों में होंगे, जिन्होंने महिला पहलवानों को नेशनल और इंटरनेशनल स्तर पर पहुंचाकर पदक दिलाया है। उनके केंद्र को फिलहाल देश के दो बेहतरीन केंद्रों में गिना जाने लगा है। यहां तक की उत्तर प्रदेश से बाहर की महिला पहलवान भी उनके केंद्र पर आकर प्रैक्टिस करना चाहती हैं।  उन्होंने मेरठ में 1997 में तब से महिला ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी थी, जब देश के किसी अन्य हिस्से में इसके बारे में सोचा भी नहीं जा रहा था।
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