जानिए, ग्रहण के दौरान क्यों नहीं खाया जाता खाना, नहाने के पीछे भी है बड़ा कारण

10 जून को लग रहा पहला सूर्य ग्रहण। भारत में नहीं दिखाई देगा सूर्य ग्रहण। राशियों और ग्रहों पर पड़ेगा प्रभाव। खगोलीय घटना का कहीं भी हो होता है प्रभाव।

By: Rahul Chauhan

Published: 09 Jun 2021, 01:26 PM IST

मेरठ। साल 2021 का पहला सूर्य ग्रहण (solar eclipse) आगामी 10 जून को लग रहा है। यह ग्रहण (grahan) हालांकि भारत में दिखाई नहीं देगा। लेकिन खगोलीय घटना होने के कारण इसका प्रभाव राशियों और ग्रहों पर पड़ेगा। पंडित अनिल शास्त्री ने बताया कि वैदिक काल से पूर्व भी खगोलीय संरचना पर आधारित कलैन्डर बनाने की आवश्कता अनुभव की गई। सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण तथा उनकी पुनरावृत्ति की पूर्व सूचना ईसा से चार हजार पूर्व ही उपलब्ध थी। ऋग्वेद के अनुसार अत्रिमुनि के परिवार के पास यह ज्ञान उपलब्ध था। वेदांग ज्योतिष का महत्त्व हमारे वैदिक पूर्वजों के इस महान ज्ञान को प्रतिविम्बित करता है।

यह भी पढ़ें: अभी तीन दिन और सताएगी जेठ की भीषण गर्मी, जानिये आपके शहर में कब होगी प्री मानसून की बारिश

उन्होंने बताया कि ग्रह नक्षत्रों की दुनिया की यह घटना भारतीय मनीषियों को अत्यन्त प्राचीन काल से ज्ञात रही है। चिर प्राचीन काल में महर्षियों नें गणना कर दी थी। इस पर धार्मिक, वैदिक, वैचारिक, वैज्ञानिक विवेचन धार्मिक एवं ज्योतिषीय ग्रन्थों में होता चला आया है। महर्षि अत्रिमुनि ग्रहण के ज्ञान को देने वाले प्रथम आचार्य थे। ऋग्वेदीय प्रकाश काल अर्थात वैदिक काल से ग्रहण पर अध्ययन, मनन और परीक्षण होते चले आए हैं।

ग्रहण के दौरान भ्रांतियों का है वैज्ञानिक कारण

पंडित अनिल बताते हैं कि ऋषि-मुनियों ने सूर्य ग्रहण लगने के समय भोजन के लिए मना किया है। क्योंकि उनकी मान्यता थी कि ग्रहण के समय में कीटाणु बहुलता से फैल जाते हैं। खाद्य वस्तु, जल आदि में सूक्ष्म जीवाणु एकत्रित होकर उसे दूषित कर देते हैं। इसलिए ऋषियों ने पात्रों के कुश डालने को कहा है, ताकि सब कीटाणु कुश में एकत्रित हो जाएँ और उन्हें ग्रहण के बाद फेंका जा सके। पात्रों में अग्नि डालकर उन्हें पवित्र बनाया जाता है ताकि कीटाणु मर जाएँ।

यह भी पढ़ें: Unlock होते ही फिर पटरी पर आई मेट्रो, इन शर्तों के साथ सफर कर सकेंगे यात्री

स्नान करने का है ये महत्व

ग्रहण के बाद स्नान करने का विधान इसलिए बनाया गया ताकि स्नान के दौरान शरीर के अंदर ऊष्मा का प्रवाह बढ़े, भीतर-बाहर के कीटाणु नष्ट हो जाएं और धुल कर बह जाएं। पुराणों की मान्यता के अनुसार राहु चन्द्रमा को तथा केतु सूर्य को ग्रसता है। ये दोनों ही छाया की सन्तान हैं। चन्द्रमा और सूर्य की छाया के साथ-साथ चलते हैं।

Rahul Chauhan
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned