Muharram 2018: मुस्लिम के साथ-साथ हिन्दू भी आते हैं इस इमाम बारगाह में आैर करते हैं सजदा

Muharram 2018: मुस्लिम के साथ-साथ हिन्दू भी आते हैं इस इमाम बारगाह में आैर करते हैं सजदा

Sanjay Kumar Sharma | Publish: Sep, 18 2018 11:37:31 AM (IST) Meerut, Uttar Pradesh, India

इस्लामी कलेंडर के 18वें सफर में इस स्थान पर हुआ था अजीबो-गरीब हादसा

 

मेरठ। मेरठ के शास्त्रीनगर का सेक्टर चार जहां पर हिन्दू आबादी अधिक है। इसी आबादी के बीच स्थित है शाह जलाल हाॅल। जब से यह हाॅल यहां है तभी से दोनों ही समुदाय के लोग बड़ी श्रद्धा के साथ इस हाल में आते हैं और सजदा करते हैं। इस शाह जलाल हाॅल के चारों ओर हिन्दू बस्ती है। मजाल क्या कभी जो यहां पर सांप्रदायिक सद्भाव भी बिगड़ जाए, जबकि राजनैतिक दलों ने हमेशा से सांप्रदायिकता की बातें की, लेकिन यहां पर आकर दोनों सम्प्रदायों का एक ही मजहब रह जाता है और वह है इंसानियत का।

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इस्लामी कलेंडर में होती है बड़ी मजलिस

इस शाह जलाल में जंग-ए-कर्बला के कई मोजजें है। यजीदी फौजों ने खेमों के लिए जब पानी रोक दिया था आैर एक रथ पर बैठे बुजुर्ग जिनकी दोनों ज़ानों पर दो बच्चे बैठे हैं की आकृति भी शीशे के फ्रेम में सुरक्षित है। इस्लामी कलेंडर के सफर माह में यहां बड़ी मजलिस होती है, जिसमें हजारों सोगवार शामिल होते है। हालांकि, इमामबारगाह से पहले शाह जलाल हॉल एक स्कूल हुआ करता था।

सुनाई दी थी बच्चों और महिलाओं के रोने की आवाजें

मोहर्रम कमेटी के संयोजक अली हैदर रिजवी के पिता रईस हैदर रिजवी ने यहां पर 90 के दशक में एक स्कूल की शुरूआत की थी। बात 1995 की है, जब इस्लामी कलेंडर माह 18वें सफर को स्कूल की छुट्टी हो गई थी, तब यहां पर अली हैदर के पिता को बच्चों और महिलाओं के रोने की आवाजें आई। उन्होंने सोचा कि स्कूल के भीतर कोई बच्चा रह गया है। जब उन्होंने स्कूल खोलकर देखा तो वहां न बच्चा था और न ही कोई बड़ा। बकौल अली हैदर रिजवी उस समय पूरा स्कूल भीनी-भीनी महक से सराबोर था। इसके अलावा उनके पिता को स्कूल की दीवारें भी हरी रोशनी में नहाई दिख रही थी।

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सफर की 18 तारीख को सोग की मजलिस

तभी से इस स्थान पर प्रत्येक वर्ष सफर माह की 18 तारीख को मोहर्रम के सोग की मजलिस के लिए वक्फ यानी आरक्षित कर दी गई। अब हर साल यहां पर 18 तारीख को बड़ी मजलिस होती है। जिसमें हजारों की संख्या में हुसैनी सोगवार शामिल होते हैं।

हवा-आंधी आए दिया नहीं बुझता

इसके अलावा 2002 में भी यहां पर एक महत्वपूर्ण घटना घटी बताया जाता है। इस जगह का नाम शाह जलाल हाल दे दिया गया। शाह जलाल हॉल के भीतर मुख्य द्वार के सामने की दीवार पर कई सालों में दीये की रोशनी की जाती थी। दीये की खास बात यह थी कि कितनी भी तेज हवा हो, लेकिन यह बुझता नहीं था।

मैदान-ए-करबला का पूरा वाकया उभरा

कुछ सालों बाद इसी स्थान पर मैदान-ए-करबला का पूरा वाकया उभर आया। इस आकृति में दो जुलजनाह के अलावा बिखरे बालों वाली एक बच्ची, एक कद्दावर शख्स (जिसमें हजरत अब्बास का तसव्वुर किया जा रहा है) नहर-ए-फरात (जहां से यजीदी फौजों ने खेमों के लिए पानी रोक दिया था) व एक रथ पर बैठे बुजुर्ग जिनकी दोनों जानों पर बैठे दो बच्चे साफ देखा जा सकता है। यह आकृति सुरक्षित रहे इसलिए अली हैदर रिजवी इसके आगे शीशे का फ्रेम बनवाकर इसे बंद कर दिए हैं।

चुनिंदा जगहों में एक शाह जलाल हाल

करबला के दर्द को हुसैनी सोगवार जितना महसूस करते हैं वो उतना ही बढ़ता जाता है। बढ़े भी क्यों न जब हुसैन के साथ उनके 71 जां-निसारों ने मैदान-ए-करबला में इस्लाम को बचाने के लिए अपनी जिंदगी तक कुर्बान कर दी। करबला वैसे तो यहां से हजारों मील के फासले पर है, लेकिन मेरठ में भी कुछ गिनी-चुनी ऐसी जगहें हैं, जहां पर करबला से संबंधित मोजजों (धार्मिक घटनाएं) अक्सर हो जाती हैं। उसी तरह सेक्टर चार स्थित शाह जलाल हाल में भी जंग-ए-करबला से संबंधित कई मोजजें हैं।

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