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इस जिले में यह वोट बैंक तय करता है किसकी बनेगी सरकार

जिले की हर सीट पर बड़ी मौजूदगी है इस वोट बैंक की
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मेरठ

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Sanjay Kumar Sharma

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Updated: 20 Jun 2018, 1:11 PM IST

meerut

इस जिले में यह वोट बैंक तय करता है किसकी बनेगी सरकार

पी त्रिपाठी, मेरठ। जुबां पर सामाजिक एकता और जातिविहीन समाज की संरचना तो दूसरी तरफ दिलों में जात की धड़कन। कुछ इस तरह है राजनीति दलों का हाल। बिना जात के दल न तो सत्ता का सुख पा सकते हैं और न ही वे बिना जात की बैसाखी के खड़े हो सकते हैं। वेस्ट यूपी आैर मेरठ इन दोनों ही जगह पर अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जाट 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में एक बड़ी निर्णायक भूमिका में होगा। अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल इस जात को साधने में दलों को पसीना आ गया है। मूल रूप से खेती किसानी से जुड़े वेस्ट यूपी का इस मूडी किस्म का जाटों का वोट बैंक कब किस ओर पलट जाए, चुनाव के ऐन मौके पर कुछ कहा नहीं जा सकता। भाकियू के चाैधरी राकेश टिकैत का कहना है कि ये जाति खेती से जुड़ी हुई और पूरी तरह से आर्य समाज को मानने वाली है, लेकिन जो इस जात के हित की बात करेगा वहीं इस अन्य पिछड़ा वर्ग की इस जात पर राज करेगा।

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मेरठ की सात सीटों पर रखते है प्रभाव

अन्य पिछड़ा वर्ग के वोट मेरठ की सभी सातों विधानसभा सीटों पर अपनी अच्छी दखल रखते हैं। मेरठ शहर सीट में हमेशा से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होता रहा है। यहां पर हारजीत का फैसला चंद हजार वोटों से होता है। इस सीट पर भी अन्य पिछड़ा वर्ग जाट सहित करीब आठ हजार वोटें हैं जो काफी निर्णायक साबित होती हैं। जब भी इस सीट पर ध्रुवीकरण हुआ भाजपा नुकसान में रही है। 2012 में भाजपा के डा. लक्ष्मीकांत वाजपेयी, सपा के रफीक अंसारी को मात्र साढ़े छह हजार वोटों से हराकर जीते थे करीब सवा तीन लाख वोटरों वाली इस सीट पर मुस्लिम सवा लाख, वैश्य करीब 70 हजार, ब्राह्मण लगभग 40 हजार, दलित वोटर 35 हजार, त्यागी 20 हजार समेत अन्य पिछड़ा वर्ग में आने वाली जाट बिरादरी और कुछ पंजाबी बिरादरी की आठ हजार वोटें हैं। मेरठ कैंट सीट इस सीट में भी यही स्थिति है। इस सीट पर 90 हजार वैश्य, 60 हजार पंजाबी, दलित 50 हजार, मुस्लिम 30 हजार, अन्य पिछड़ा वर्ग की 20 हजार वोटें हैं। यहां भी अन्य पिछड़ा वर्ग की 20 हजार वोटें बहुत प्रभावी है जीत-हार का समीकरण तय करने में। मेरठ दक्षिण सीट आधे से ज्यादा शहरी वोटरों वाली यह सीट 2012 के चुनावों में अस्तित्व में आई। इस सीट पर सर्वाधिक मुस्लिम हैं। इस सीट पर भी अन्य पिछड़ा वर्ग की करीब 15 हजार वोटें हैं।

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यहां भी इनकी ही बड़ी मौजूदगी

मेरठ की किठौर विधानसभा सीट पर 20 हजार अन्य पिछड़ा वर्ग की वोटें हैं। यहां पर जातीय समीकरणों पर ही हार-जीत का फैसला होता है। महाभारत की गाथा रही हस्तिनापुर सीट में भी अन्य पिछड़ा वर्ग के वोटों की संख्या करीब 22 हजार के आसपास है। जिनमें जाट अधिक हैं। मेरठ की सरधना सीट यूं तो ठाकुर बाहुल्य है, लेकिन यहां पर भी अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जाटों की संख्या करीब 26 हजार है जो निर्णायक स्थिति में रहती है। 2012 में सुरक्षित से सामान्य सीट हुई सिवालखास पर जातिगत बंटवारे से ही हार-जीत तय होती आई है। इस सीट पर अन्य पिछड़ा वर्ग की 40 हजार वोटरों पर ही उम्मीदवार का भविष्य टिका रहता है।

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