#OnceUponaTime देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और इस सिद्धपीठ मंदिर के बीच गहरे जुड़ाव की अनकही कहानी

Sanjay Kumar Sharma | Updated: 16 Aug 2019, 03:55:22 PM (IST) Meerut, Meerut, Uttar Pradesh, India

खास बातें

  • ब्रिटिश हुकूमत में काली पल्टन के सिपाही मंदिर में आते थे पानी पीने
  • चर्बीयुक्त कारतूस पर विवाद के बाद भारतीय सैनिकों ने कर दिया था विद्रोह
  • काली पल्टन मंदिर सिद्धपीठ होने के कारण आज दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु

मेरठ। देश की आजादी के लिए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मेरठ से ही शुरू हुआ था। इस संग्राम को लेकर तमाम तथ्य बताए जाते रहे हैं, लेकिन 'पत्रिका' जो तथ्य बताने जा रहा है, वह आपने न तो कहीं पढ़ा होगा और न ही सुना होगा। दरअसल, 1857 की क्रांति शुरू हुई थी यहां मेरठ कैंट स्थित काली पल्टन (अब श्री औघड़नाथ मंदिर) मंदिर से। यहां काली पल्टन (भारतीय सैनिकों को काली पल्टन कहा जाता था) के सैनिक मंदिर में पानी पीने आते थे। यहां से भड़की चिंगारी देश का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहलाया। इस भड़की चिंगारी के बारे में 'पत्रिका' को बता रहे हैं काली पल्टन मंदिर के पुजारी पंडित सारंग धर त्रिपाठी।

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पानी पीने आते थे काली पल्टन के सिपाही

काली पल्टन मंदिर के पुजारी पंडित सारंगधर त्रिपाठी बताते हैं कि मंदिर के पीछे काली पल्टन यूनिट थी। 1857 में मंगल पांडे और उनकी यूनिट पश्चिम बंगाल से सीजफायर के लिए यहां भेजी गई थी। उस समय काली पल्टन यूनिट के बराबर में एक कुंआ था। इसके चारों ओर खाली मैदान था और यहां एक शिवलिंग था। काली पल्टन के सिपाही यहां के कुएं पर पानी पीते थे और पूजा किया करते थे। मंदिर के पीछे बनिया बाजार था। तब यहां सुल्तानपुर के रहने वाले बाबा शिवचरण दास आर्मी की इलाहाबाद यूनिट से मेरठ आए थे, आर्मी को रिजाइन करने के बाद वह कुएं पर काली पल्टन को पानी पिलाया करते थे।

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पानी पीने को लेकर यह हुआ था विवाद

काली पल्टन मंदिर के पुजारी पंडित सारंगधर त्रिपाठी बताते हैं कि मंगल पांडे और उनकी यूनिट के सिपाही यहां जब पानी पीने आए तो बाबा शिवचरण दास ने पानी पिलाने से मना कर दिया था। मंगल पांडे ने कहा कि ब्राह्मण हूं और पश्चिम बंगाल से हम आए हैं, पानी क्यों नहीं पिला रहे हो। इस पर बाबा ने कहा कि तुम चर्बीयुक्त कारतूस मुंह से खोलते हो, इसलिए पीछे हटकर पानी पीयो। इसी बात पर विवाद हो गया। मंगल पांडे और काली पल्टन के अन्य सिपाहियों ने बाबा के साथ मारपीट कर दी। इस पर बाबा ने कहा था कि जिस तरह तुम मुझे मार रहे हो, तुम्हारे साथ भी ऐसा ही होगा। यह बात काली पल्टन के सिपाहियों को ऐसी लगी कि उन्होंने ब्रिटिश सैन्य अफसरों से चर्बीयुक्त कारतूस चलाने को मना करके विद्रोह कर दिया।

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विरोध के बाद भड़क उठे थे सैनिक

काली पल्टन के पुजारी पंडित त्रिपाठी ने 'पत्रिका' को बताया कि काली पल्टन के सिपाहियों का यह विद्रोह ऐसा भड़का कि उन्होंने यहां ब्रिटिश अफसरों को मारना शुरू कर दिया। काफी अफसर मारे गए। इससे ब्रिटिश हुकूमत में उस दिन हड़कंप मच गया। इसके बाद काली पल्टन के सैनिक मेरठ से दिल्ली पहुंचे। उस समय बहादुर शाह जफर दिल्ली की गद्दी पर थे। उनके वजीर मीर कासिम अंग्रेजों से मिले हुए थे। पंडित सारंग धर त्रिपाठी बताते हैं कि रात को लाल किला का दरवाजा बादशाह ने खुलवा दिया था। काली पल्टन के सिपाही जब अंदर गए तो उन्हें खाने में जहर देकर कइयों को मार दिया गया, जो वापस बचे वे वापस लौट आए थे। बताते हैं कि 15 मई को देशभर में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत का निर्णय हुआ था, लेकिन काली पल्टन के सिपाहियों का मंदिर के कुएं पर हुए विवाद के कारण पांच दिन पहले ही विद्रोह हो गया।

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काली पल्टन मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग

काली पल्टन मंदिर के पुजारी पंडित सारंगधर त्रिपाठी का कहना है कि इस सिद्धपीठ में स्वयंभू शिवलिंग है। उस समय काली पल्टन के सिपाहियों ने इसे पत्थर जानकर खोदना शुरू किया था, लेकिन काफी गहराई तक जाने पर भी वे इस निकाल नहीं पाए थे। फिर उन्होंने इसके चारों ओर के गड्ढे भरते हुए मिट्टी से लीपकर पूजा-अर्चना शुरू कर दी थी तो उन्हें लाभ मिला। इसके बाद पूजा के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगी। अब इसकी सिद्धपीठ के रूप में मान्यता है।

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