जानिए, वेस्ट यूपी के इस जिले में किस तरह तय होते हैं प्रत्याशी

जानिए, वेस्ट यूपी के इस जिले में किस तरह तय होते हैं प्रत्याशी
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sandeep tomar | Publish: Jan, 06 2017 06:13:00 PM (IST) Noida, Uttar Pradesh, India

वेस्ट यूपी की कुछ सीटें चुनावों में अपनी खास अहमितय रखती हैं

नोएडा: यूपी में विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है। चुनाव आयोग ने तारीखों के साथ ये भी तय कर दिया है कि प्रत्याशियों को क्या करना है या नहीं। वहीं सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस बात को कह चुका है कि कोई भी प्रत्याशी धर्म और जाति के नाम पर वोट नहीं मांग सकता है। लेकिन वेस्ट यूपी का एक जिला ऐसा भी है जहां ग्राम प्रधान के चुनाव से लेकर लोकसभा चुनावों तक धर्म और जाति के नाम पर वोट दिए जाते हैं। ये जिला और कोई नहीं बल्कि मेरठ है। जहां पर 7 विधानसभा सीटें हैं। जहां पर धर्म और जाति की राजनीति काफी हावी है।

भापजा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष की किस्मत होगी तय

मेरठ शहर सीट मेरठ शहर सीट सांप्रदायिक आधार पर धु्रवीकरण होने पर ही भाजपा के खाते में गई है। जब-जब यहां पर भाजपा के वोट कटे हैं तो उसके प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा है। 2012 के चुनावों में यहां से भाजपा के डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने सपा के रफीक अंसारी को साढ़े छह हजार वोटों से हराकर जीत हासिल की थी। तीन लाख से ज्यादा वोटरों वाली इस सीट पर मुस्लिम एक लाख से ज्यादा, वैश्य करीब 50 हजार, ब्राह्मण लगभग 30 हजार, दलित वोटर 25 हजार, त्यागी, 15 हजार समेत पंजाबी आदि बिरादरी के वोटर है। यहां पर मुस्लिम वोटरों का बंटवारा होने से ही भाजपा प्रत्याशी चुनाव जीत पाते हैं। इस बार स्थिति कुछ अलग दिखाई दे रही है। इस सीट पर इस बार बीएसपी की ओर से हिंदू कैंडीडेट खड़ा कर दिया है। जिस कारण से भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है।

इस सीट पर दाव पर भाजपा की प्रतिष्ठा

मेरठ कैंट सीट को भाजपा की सबसे मजबूत सीटों में माना जाता है, लेकिन 2012 के चुनावों में यहां से भाजपा के सत्यप्रकाश अग्रवाल केवल साढ़े तीन हजार वोटों के अंतर से अपनी सीट बचा पाए थे। 1989 से इस सीट अपने कब्जे में रखने के कारण भाजपा की प्रतिष्ठा फिर से दांव पर लग हुई है। यहां पर करीब चार लाख वोटर्स में से 70 हजार वैश्य, 50 हजार पंजाबी, दलित 40 हजार, मुस्लिम 25 हजार, जाट 15 हजार समेत कई बिरादरियों की संख्या प्रभावी है। यहां से भाजपा के सत्यप्रकाश अग्रवाल चौथी बार टिकट हासिल करने के जुगाड़ में लगे हैं तो विरोधी खेमा उन्हें हटाने के प्रयास में है। ताज्जुब की बात तो ये है कि इस सीट पर जातिय समीकरणों के आधार पर वोटिंग होती है। दलित-मुस्लिम और जाट फैक्टर काफी बड़ा फर्क पैदा कर देता है।

बसपा मचा सकती है खलबली

मेरठ दक्षिण सीट आधे से ज्यादा शहरी वोटरों वाली है। यह सीट 2012 के चुनावों में अस्तित्व में आई और पहली बार यहां पर वोट डाले गए। भाजपा के रविंद्र भड़ाना ने यहां पर बसपा प्रत्याशी राशिद अखलाक को हराकर जीत हासिल की थी। इस बार भी पहले की तरह भाजपा में टिकट को लेकर घमासान है। वर्ष 2012 में डॉ. सोमेंद्र तोमर का टिकट काट कर रविंद्र भड़ाना को दिया गया था। इस बार ऐसा होता नहीं दिख रहा है। 4 लाख से ज्यादा वोटरों वाली इस सीट पर सबसे ज्यादा मुस्लिम हैं। यहां पर भी मुस्लिमों के जातियों में बंटकर वोट देने के कारण भाजपा को जीत हासिल हुई। इस बार भाजपा के लिए मुश्किल पैदा हो गई है। क्योंकि यहां से बसपा ने अपना मजबूत कैंडीडेट खड़ा किया है। इस सीट पर गुर्जर 25 हजार, त्यागी 15 हजार, वैश्य 50 हजार, दलित 40 हजार, पंजाबी 10 हजार समेत कई बिरादरियों के मत निर्णायक हैं।

सपा का रहा है एकछत्र राज

किठौर सीट पर प्रदेश के श्रम मंत्री शाहिद मंजूर का दबदबा रहा है। वह फिर से चुनाव मैदान में उतरेंगे। भाजपा को इस सीट पर केवल एक बार 1996 में रामकृष्ण वर्मा के रूप में जीत हासिल हुई थी। करीब साढ़े तीन लाख वोटरों वाली इस सीट पर सबसे ज्यादा मुस्लिम सवा लाख हैं, तो त्यागी 50 हजार, गुर्जर 40 हजार, ठाकुर 25 हजार, दलित 50 हजार, जाट 15 हजार समेत कई छोटी बिरादरी के वोटर भी निर्णायक हैं। सपा को शिकस्त देने के लिए भाजपा यहां से त्यागी या गुर्जर बिरादरी के प्रत्याशी उतारने पर विचार कर रही है। यहां पर जातीय समीकरणों पर ही हार-जीत का फैसला होगा।

बसपा और सपा में होगी कड़ी टक्कर

महाभारत की गाथा की गवाह रही हस्तिनापुर की धरती पर एक बार फिर से चुनावी तेवर देखने को मिल रहे हैं। जनपद की एकमात्र सुरक्षित सीट पर सवा तीन लाख मतदाता हैं। इनमें गुर्जर वोटरों की बहुतायता है। यहां पर गुर्जर 80 हजार, दलित 65 हजार, मुस्लिम 60 हजार, त्यागी 15 हजार, जाट 20 हजार के साथ ही अन्य पिछड़ा वर्ग की वोट भी बहुत है। यहां से सपा के प्रभुदयाल वाल्मीकि को शिकस्त देने के लिए बसपा के योगेश वर्मा अभी मैदान में हैं। भाजपा के कई दावेदार भी ताल ठोंक रहे हैं। लेकिन यहां पर असली मुकाबला बसपा और सपा के बीच ही देखने को मिलेगा।

दो फायर ब्रांड नेताओं में देखने को मिलेगी जंग

सरधना सीट बीजेपी के फायर ब्रांड नेता संगीत सोम के कारण चर्चा में रही है। भाजपा के लिए यह सीट इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इससे पहले वो इस सीट को पांच बार अपने नाम कर चुकी है। वहीं, मुजफ्फरनगर दंगों में चर्चित संगीत सोम के कारण यह सीट काफी हॉट हो गई है। वह फिर से भाजपा के टिकट के प्रबल दावेदार हैं तो सपा से बगावत करने वाले अतुल प्रधान भी ताल ठोक रहे हैं। सवा तीन लाख वोटरों वाली इस सीट पर मुस्लिम सबसे ज्यादा करीब एक लाख हैं। इसके बाद दलित 50 हजार, ठाकुर 45 हजार, गुर्जर 35 हजार, जाट 25 हजार, सैनी 25 हजार समेत त्यागी-ब्राम्हण भी निर्णायक स्थिति में हैं। यहां पर जातिगत बंटवारे से ही इस बार भी हार-जीत तय होगी। यहां पर सीधी टक्कर अतुल प्रधान और संगीत सोम के बीच देखने को मिलेगी।

सपा फिर से जीतने की करेगी कोशिश

2012 के चुनावों में सुरक्षित से सामान्य सीट हुई सिवालखास पर जातिगत बंटवारे से ही हार-जीत तय होती आई है। करीब तीन लाख से अधिक वोटरों वाली सिवालखास सीट पर सपा के गुलाम मोहम्मद विधायक हैं और इस बार भी ताल ठोक रहे हैं। यहां से मुस्लिम करीब 90 हजार, जाट 75 हजार, दलित 45 हजार, त्यागी-ब्राम्हण 50 हजार, अन्य पिछड़ा वर्ग 40 हजार वोटरों पर ही उम्मीदवार टिके हुए हैं। यहां से टिकट के सबसे ज्यादा ज्यादा दावेदार भाजपा से ही है। रालोद के नेताओं में भी घमासान मचा हुआ है।
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