Independence Day: ये है मिनी जलियांवाला, यहां भी अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों के सीने में दागी थी गोलियां, गायब कर दिए थे शव

Highlights

  • अंग्रेज इंस्पेक्टर चौपाल पर पहुंचा था बंदूक लहराता
  • ग्रामीणों पर बरसा दी थी ताबड़तोड़ गोलियां

By: Rahul Chauhan

Updated: 14 Aug 2020, 01:39 PM IST

केपी त्रिपाठी

मेरठ। मेरठ और पश्चिम उप्र का जर्रा—जर्रा आजादी की गाथाओं से भरा पड़ा है। यहां के ग्रामीणों ने भी आजादी की लड़ाई में अपना पूर्ण योगदान दिया था। आज भी मेरठ के गांवोें में असंख्या बलिदानी हैं जो इतिहास के पन्नों में भी गुमनाम हैं। मेरठ के सरधना क्षेत्र का गांव भामौरी। जो कि मिनी जलियावाला गांव के नाम से भी जाना जाता है। यह गांव भामौरी अंग्रेजों के जुल्म का गवाह है। 18 अगस्त 1942 का वह काला दिन आज भी गांव के लोग याद कर उठते हैं तो उनका खून खौल उठता है।

चौपाल पर शांत बैठे ग्रामीणों के पर ताबड़तोड़ बरसाई गोलियां :—

18 अगस्त 1942 को भामौरी गांव में मोटो की चौपाल पर गांधी आश्रम के कार्यकर्ता पंडित रामस्वरूप शर्मा ग्रामीणों को गांधी का संदेश दे रहे थे। सर्किल इंस्पेक्टर मो.याकूब बंदूक लहराते पहुंचा और चौपाल पर शांत बैठे ग्रामीणों से अभद्रता की। फिर भी ग्रामीण शांत रहे। इसके बावजूद ब्रिटिश सिपाहियों ने याकूब के कहने पर ग्रामीणों पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दीं। इससे प्रहलाद सिंह, लटूर सिंह, फतेह सिंह व बोबल सिंह मौके पर ही शहीद हो गये। घायल ठा. देवी सिंह, रणधीर, जमादार सिंह, बलजीत सिंह,बाबूराम शर्मा, शिवचरण सिंह,चेतनलाल जैन समेत अनेक क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करके मुकदमा चलाया।

18 क्रांतिकारियों को हुई थी 12 वर्ष कैद की सजा :—

18 क्रांतिकारियों को 12-12 वर्ष कैद की सजा दी गयी। अंग्रेज सिपाहियों ने पंडित रामस्वरूप के सीने में तीन गोलियां मारीं। इसके बाद पंडित रामस्वरूप शर्मा को मरणासन्न अवस्था में बंदी बनाकर यातनाएं दी गईं। उनके जख्मों को संगीनों से कुरेदा। वांछित जानकारी नहीं मिलने पर अंग्रेजों ने संगीन से उनकी गर्दन पर वार किए और उन्हें बलिदानी बना दिया। यही नहीं अंग्रेजों ने पंडित रामस्वरूप के शव को ही गायब कर दिया। हालांकि बाल जासूस राजनीत रुहेला ने क्रांतिकारियों को इसकी जानकारी दी।

थाना घेरकर गडढे से निकाला था शव, पूरे गांव केा बगावती घोषित कर दिया :—

क्रांतिकारियों ने शव की मांग को लेकर थाना घेर लिया। गांधी आश्रम के सचिव लज्जाराम और ग्रामीणों के तीखे विरोध पर उनके शव को गड्ढे से निकाला गया। इसके बाद थाने में ही शव का अंतिम संस्कार किया गया। इन शहीदों की याद में गांव में स्मारक बना हुआ है। इस कांड के बाद अंग्रेज गवर्नर ने भामौरी गांव को ही बागी घोषित कर दिया। गांव को उड़ाने के लिये ट्रक पर लादकर तोप तक रवाना कर दी गईं। देशभक्त ट्रक चालक लियाकत अली ने ट्रक को झिटकरी के तालाब में धंसा दिया। बाद में गांव को तोप से उड़ाने का फैसला वापस ले लिया। इसके बावजूद गांव से 19 हजार रुपये जुर्माना वसूला गया। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने ग्राम पहुंचकर पवित्र माटी को नमन किया। वर्तमान में मोटो की चौपाल को गांधी आश्रम बनाया जा चुका है।

Show More
Rahul Chauhan
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned