मिर्जापुर के रहस्यमयी पहाड़ी में छिपा है भारी खजाना, जो इस खास स्तंभ को बाहों में भरेगा उसी को मिलेगा धन

Jyoti Mini

Publish: Dec, 08 2017 01:23:51 (IST) | Updated: Dec, 08 2017 01:29:06 (IST)

Mirzapur, Uttar Pradesh, India

सुरेश सिंह

मिर्ज़ापुर. जिले के अहरौरा में ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल महाभारत कालीन महाराज भूरिश्रवा की राजधानी भुइलीखास पहाड़ पर आज भी स्थित है। यहीं से राजा भूरिश्रवा कुरुक्षेत्र की लड़ाई में कौरव की तफर से प्रतिनिधित्व करते थे। कुरुक्षेत्र कि लड़ाई में भाग लिया था। महाभारत में महाराज भूरिश्रवा और सात्विक कि लड़ाई का विशेष वर्णन किया गया है। महाभारत में उल्लेख के अनुसार लड़ाई में महाराजा भूरिश्रवा ने वीरता के साथ लड़ा और सात्विक के हाथों वीरगति को प्राप्त हुए। गीता में भी इस लड़ाई का उल्लेख मिलता है। महाभारत कालीन इस साम्राज्य की राजधानी का अवशेष आज भी अहरौरा में भुइली कि पहाड़ियों पर मिलता है। आज भी गांव के लोग पहाड़ी के अंदर एक बहुत बड़े समृद्ध किले के होने की बात करते हैं। जिसका रहस्य आज तक नहीं खुल पाया है। पहाड़ों की खुदाई में कई बार कीमती कांच के शीशे पत्थर भी लोगों के हाथ लगे हैं। जिसके बाद पुरातत्व विभाग के द्वारा इस पहाड़ पर खुदाई कार्य प्रतिबंधित कर दिया गया है।

 

इस गाांव की प्राकृतिक संरचना यह बताता है कि, यह राजधानी पूर्व में सामरिक दृष्टी से सोच समझ कर बनाया गया थाा। पहाड़ की ऊँचाई पर बनाये गए किले के चारों तरफ प्राकृतिक सुरक्षा की मौजूदगी थी। इसके दक्षिण पश्चिम एवं उत्तरी दिशा में विशाल पर्वत श्रृंखला भुइली को सुरक्षित रखती थी जबकि पूर्वी दिशा में एक विशाल ताल था जो इसे सुरंक्षित रखता था जो आज भी मौजूद है। यहां पर खुदाई में लगातार हिन्दू देवी देवताओं के मंदिर दिखलाई पड़े हैं।

 

जिससे यह साबित होता है कि, शताब्दियों पूर्व यह हिन्दू नरेश की राजधानी थी। हालांकि 11वीं शताब्दी में भारत मुस्लिम आक्रांताओं ने आक्रमण कर यहां के हिन्दू राजवंश को परास्त कर मौजूद सभी मंदिरों को नष्ट कर दिया था।तभी से इस किले पर उनका कब्ज़ा हो गया था। पहाड़ी पर आज भी कई सुरंग और रास्ते बने हुए हैं जिसका पता आज तक कोई नहीं लगा पाया। ऐतिहासिक विक्त का उल्लेख आज भी यहां दिखाई पड़ता है। शिवलिंग आज भी लोगों में है आस्थावान का प्रतीक जो बाहों में भर लेगा उसे मिलेगा बड़ा खजाना।

 

 

पहाड़ी पर एक प्राचीन कुंआ एव स्तम्भ आज भी दिखलाई पड़ता है। वर्षों से श्रद्धालु उसे शिवलिंग मानकर पूजन करते हैं। स्थानीय लोगों का मनना है कि, जो व्यक्ति इस स्तम्भ को अपनी बाहों में भर लेगा उसे जमीन में गड़े खजाने की प्राप्ती होगी। आस-पास के लोगों ने इस स्तम्भ को अपनी बाहों में भरने की कोशिश की मगर आज तक कोई कामयाब नहीं हो पाया। मौजूद स्तंभ सीधा न हो कर थोड़ा सा झुका हुआ है। ग्रामीणों के अनुसार किवदंती के अनुसार एक व्यक्ति ने स्तम्भ को अपने बाहों में भरने का प्रयास किया जैसे ही दोनों हाथों कि अंगुलिया आपस मे मिली स्तंभ झुकने लगा लेकिन वह डर की वजह से स्तम्भ को छोड़ दिया। तभी से स्तंभ झुका हुआ आज भी वहीं खड़ा हुआ है।

 

बाहर से आने वाले सैलानी भी खजाने के लिए प्रयास करते हैं। मगर कामयाबी हाथ नहीं लगी। वहीं इतिहासकारों के अनुसार महाराजा भूरिश्रवा ने संकेत के लिए ही इस प्राचीन स्तम्भ का निर्माण कराया था। जो कालांतर में खजाने का प्रतीक चिन्ह के रूप में प्रसिद्ध हुआ है। "ऐतिहासिक डाक चौकी" पहाड़ी के सामरिक दृष्टिकोण से मजबूत होने के कारण सोलहवीं सदी में शेरशाह सूरी ने भी अपने द्वारा संकेतो के आदान प्रदान के लिए बनवाया गया डाक चौकी के लिए इसी स्थान का चुनाव किया।

 

शेरशाह सूरी द्वारा बनवाया गया। डाक चौकी आज भी ऐतिहासिक धरोहर के रुप में मौजूद है।सन् 1999 प्रधान श्रीमती चौरसिया ने ऊपर चढ़ने के लिए यहां सीढ़ियों का निर्माण कराया था। हालांकि संरक्षण के अभाव में आज यह टूटने के कगार पर पहुच चुका है। आज भी मौजूद है गुरु तेगबहादुर का ऐतिहासिक तालाब इतिहास में इस स्थान की कितनी महत्ता है, यह इसी बात से सिद्ध हो जाता है कि कभी सिखों के 9वे गुरु तेगबहादुर ने भी उपदेश के लिए इसी स्थान को चुना था। आज भी गांव के पूर्वी दिशा में एक बड़ा ताल स्थित है और गुरु तेकबहादुर गुरुद्वारा है। कहते है 17वीं सदी में यहीं पर भारत भ्रमण के समय सिखों के नौवें गुरू तेक बहादुर ने उपदेश दिया था। काशी राज्य में विशेष स्थान था भुइली व शेरवां का।

 

 

किदवंतियों में भुइली एवं शेरवां को महाभारत कालीन राजा भूरिश्रवा की राजधानी के रुप में जानी जाती है। उस समय भुइली एवं शेरवां काशी के राजनैतिक पटल पर विशिष्ट रखता था। शताब्दियों पूर्व यह क्षेत्र हिन्दू नरेश की राजधानी थी, इसका प्रमाण पहाड़ो की खुदाई में मिले हिन्दू देवी देवताओं के मंदिरों से भी प्रणाणित होता है। जिसका सम्बन्ध काशी के राजघरानों से भी रहा है। सुरंगों के रहस्य को जानने की ग्रामीणों ने की थी कोशिस। गांव के लोगों में सुरंग को लेकर रहस्य था।

 

लेकिन ग्रामीणों की माने तो गांव के खोजी प्रवृत्ति के लोग स्व0 लक्ष्मी कान्त पाण्डे के नेतृत्व में पाँच सदस्यी टीम सुरंग के अंदर प्रवेश कर पता लगाने की कोशिस की थी। सुरंग में काफी जगह था।सुरंग के अंदर कथा आकृति शिल्प से रास्ता बंद था जिससे टीम को वापस लौटना पड़ा था। यहां पर खुदाई में मिले पस्तर निर्मित कला कृतियों को वाराणसी के संस्कृत विश्वविद्यालय संग्रहालय में आज भी सुरंक्षित रखी गयी है। पहाड़ी पर बाबा मकदूम शाह कि मजार यहां पहाड़ी में मौजूद बाबा मकदूम शाह की मजार आज भी हिन्दू एवं मुस्लिम लोगों के आस्था का प्रतिक है। जहां गुरुवार व रविवार को दूर दूर से सभी समुदाय के लोग मन्नत मांगने आते हैं। प्रशासनिक उपेक्षा से ऐतिहासिक धरोहर खत्म होने के कगार पर। स्थानीय विधायक ने जगाई उम्मीद। प्रसाशनिक और पुरातत्व विभाग की उदासीनता के चलते। पुरातत्व विभाग ने खनन पहाड़ी पर खनन कार्य को किया है प्रतिबंधि किया है मगर प्रसासन और पुरातत्व विभाग की उदासीनता से अभी तक ऐतिहासिक धरोहरों को संजोने का कोई कार्य नहीं दिखलाई पड़ता है।

 

जिससे इसका अस्तित्व ही खतरे में था। हालांकि खत्म होने के कगार पर पहुच चुके महाभारत काल के राजा भूरिश्रवा की राजधानी रही भुइलीखास के दिन अब जल्द ही बहुरेंगे की उम्मीद जगी है । रविवार को मड़िहान विधायक रमाशंकर सिंह पटेल ने मौके पर जाकर ऐतिहासिक धरोहरों का निरीक्षण किया। जिससे ग्रामीणों को जो वर्षों से पर्यटन के रुप में विकसित करने का जो इंतिजार था अब वह जल्द ही समाप्त होने वाला है। मड़िहान विधायक ने इसके लिए कार्य तेज कर दिया है। पर्यटन केंद्र बनाकर यहाँ के युवाओं को रोजगार उपलब्ध हो इसके लिये जल्द ही विधायक रमाशंकर पटेल पर्यटन मंत्री से मिलकर जल्द ही पहल करेंगे।

 

जानकारों की माने तो भुइलीखास के ऐतिहासिक धरोहरों को संजोकर इसे पर्यटन के रुप में विकसित कर दिया जाय तो यह पिछड़ा क्षेत्र विकास की ओर आगे बढ़ेगा और यहां के युवाओं को रोजगार के लिए दूसरे जनपदों प्रदेशों को पलायन नहीं करना पड़ेगा। पर दुर्भाग्य है कि, जिस विभाग को इसकी रखवाली का दायित्व सौपा गया है उसकी उदासीनता के चलते ऐतिहासिक धरोहर खंडरों में तब्दील होते जा रहे हैं। अगर समय रहते इसपर ध्यान नहीं दिया जाता तो आने वाली पीढ़ी के लिए यह मात्र मिटटी बन कर रह जाएगा और ऐतिहासिक धरोहर का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

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