इकलौता बेटा 13 साल की उम्र में बना संयासी, 70 दिनों में की 20 हज़ार किमी पैदल यात्रा

लोगों का कहना है कि अपने इकतौते बेटे को इस तरह से त्यागकर दिलीप और भावना ने अपने बड़े दिल का उदाहरण दिया है।

नई दिल्ली। गुजरात की धरती के नाम एक और इतिहास जुड़ गया है। स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के त्याग के बाद गुजरात की धरती एक बार फिर से त्याग की गवाह बनी। आदि सिंघवी नाम का लड़का दुनिया के सभी प्रकार की मोह-माया को त्याग कर संयासी बन गया है। खास बात ये है कि यह लड़का अभी सिर्फ 13 साल का है और दुनिया के सभी मोह माया को त्यागने का फैसला लेकर संयासी बन गया। आदि सिंघवी गुजरात की पावन मिट्टी पर संयासी बन गए। आदि ने कालिकुंड तीर्थ में दीक्षा प्राप्त की और संसार के सभी मोह-माया को त्याग कर संयासी का रूप धारण कर लिया।

आदि अभी 5वीं कक्षा के छात्र थे। वह महाराष्ट्र के ठाणे के एक नामी अंग्रेज़ी मीडियम स्कूल के छात्र थे। संयासी बनने के बाद आदि अब अर्पणविजय जी बन गए हैं। आदि मूल रूप से जालौर के रहने वाले थे। खास बात ये है कि आदि अपने माता-पिता के इकलौते बेटे थे। लेकिन बेटे की ख्वाहिश के आगे माता-पिता भी खुशी-खुशी उन्हें संयासी बनने की अनुमति दे दी और अपने सामने ही दीक्षा प्राप्त कराई।

लेकिन अब जो बात हम आपको बताने जा रहे हैं, उसे सुनने के बाद आप यकीन नहीं कर पाएंगे। बता दें कि दीक्षा प्राप्त करने से पहले आदि ने देश भर के कई हिस्सों में करीब 20 हज़ार किलोमीटर की पैदल यात्रा की। इतनी लंबी यात्रा उन्होंने सिर्फ 70 दिनों में पूरी कर ली। आदि की दीक्षा प्राप्ती के समय वहां उनका पूरा परिवार मौजूद था। आदि अपने पिता दिलीप संघवी और मां भावना के इकलौते बेटे हैं। बेटे के अलावा उनकी एक बेटी भी है। बेटी आदि से छोटी है, वह अभी 9 साल की है।

13 साल की उम्र में संयासी बनकर आदि ने सभी लोगों को चौंका कर रख दिया है। इसके अलावा लोग आदि के माता-पिता के इस त्याग को लेकर भी काफी चर्चाएं कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि अपने इकतौते बेटे को इस तरह से त्यागकर दिलीप और भावना ने अपने बड़े दिल का उदाहरण दिया है।

Priya Singh Content Writing
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