काश! पर्यावरण का भी होता अपना वोटबैंक

MUKESH BHUSHAN

Publish: Nov, 14 2017 02:52:12 (IST)

Miscellenous India
काश! पर्यावरण का भी होता अपना वोटबैंक

प्रदूषण जैसे मुद्दे भी चुनावी गणित ध्यान में रखकर तय किए जा रहे हैं। वह दिन कब आएगा जब मानव अस्तित्व को बचाने के मामलों पर कोई राजनीति नहीं होगी?

दिल्ली की हवा आमतौर पर खराब ही रहती है। हायतौबा इसपर तब मचती है जब खराबी इतनी ज्यादा हो जाए कि दम घुटने लगे और अस्पतालों में सांस के मरीजों की संख्या बीस फीसदी बढ़ जाए।
आमतौर पर ऐसा दीपावली के बाद होता है। पहले दिवाली के पटाखों को कटघरे में खड़ा किया जाता है और उसे अदालत से तरीपार (दिल्ली से बेदखल) करने का हुक्म सुना दिया जाता है।
उसके बाद बारी आती है राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के पड़ोसी राज्यों के किसानों की जो, अपने खेतों को अगली फसल के लिए तैयार करते समय पराली जलाते हैं। इसका कार्बन डायआक्साइड गुनगुनी ठंड के साथ मौसम में शामिल होते कोहरे के रोमांच के साथ घुल जाता है और पूरे वातावरण को जहरीला बना देता है।
इसके साथ ही सभी राजनीतिक दल और सरकारें अपने-अपने वोटबैंक के अनुसार पोजिशन ले लेते हैं। साल-दर-साल यह सिलसिला कायम होता जा रहा है।

दिल्ली सरकार के फैसले रोमांटिक

दिल्ली सरकार सड़क पर गाडियों को नियंत्रित करने के लिए ऑड-ईवन फार्मूला लेकर आती है जो यहां रहनेवाली सबसे बड़ी आबादी यानी मध्यम वर्ग को एक रोमांटिक फैसला लगता है, बशर्ते दोपहिया वाहनों, महिलाओं और बच्चों को छूट देते हुए लागू किया जाए। जबकि, यह स्थापित होना अभी बाकी है कि इससे वाकई वातावरण पर कोई सकारात्मक प्रभाव होता है।
पंजाब और हरियाणा की सरकारें अपने यहां के वोटबैंक को ध्यान में रखकर पराली जलानेवाले किसानों के पक्ष में खड़ी दिखने लगती हैं और दिल्ली सरकार की इस दलील को मानने से इनकार कर देती हैं कि किसानों को ऐसा करने से रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए।
इन सबके बीच, दिल्ली पर अपनी 'बॉसगीरी' दिखाने का कोई मौका न छोड़नेवाली केंद्र सरकार 'दूसरे दर्जे की राज्य सरकार पर सारी जिम्मेदारी छोड़ते हुए मौन हो जाती है। आखिरकार, सारा दारोमदार न्यायपालिका और मीडिया पर आ जाता है। सभी जानते हैं कि दोनों की सीमित भूमिका है।


न्यायपालिका व मीडिया की भूमिका सीमित

न्यायपालिका आदेश दे सकती है पर लागू कराने की जिम्मेदारी कार्यपालिका पर है। उसीतरह मीडिया खतरे और लापरवाहियों को उजागर कर सकता है पर उसे दूर करने का दायित्व नहीं निभा सकता।
राजनीतिक कलाबाजी का नतीजा यह है कि अपने-अपने वोटबैंक को साधकर सभी सरकारें चैन की नींद सो जाती हैं।
हम जानते हैं कि पर्यावरण किसी का वोटबैंक नहीं है। न तो यह चुनाव में मुद्दा बनता है और न ही इसके आधार पर हम संसद या विधानसभाओं का चयन करते हैं। जबकि अध्ययन से यह बात सामने आ रही है कि कुपोषण के बाद वायु प्रदूषण भारत में जिंदगी खराब करनेवाली दूसरी सबसे बड़ी वजह है।

मानव अस्तित्व को बचाने से बड़ा मुद्दा क्या?

पर्यावरण विशेषज्ञ गला फाड़कर चिल्ला रहे हैं कि हम अपने बच्चों के लिए अच्छा नहीं कर रहे। अपने लालच और उत्पादन आधारित विकास को सिर पर बैठाकर हम अपनी ही भावी पीढ़ी को मुश्किलों में डाल रहे हैं।
इन विशेषज्ञ की बातें सुनी जरूर जाती है पर वोटबैंक नहीं बना पाती। चूंकि वैश्विक विकास जीडीपी के केंद्रविंदू पर ही घूम रहा है, इसलिए ऐसी कोई भी बात जिससे जीडीपी पर प्रतिकूल असर पड़ता हो देशद्रोह जैसा माना जा सकता है।
असल में सावधान तो हमें होना है। सबकुछ जानते हुए भी हम अनजान बने हुए हैं। आखिर अगला चुनाव कुपोषण और प्रदूषण जैसे मुद्दों पर ही क्यों नहीं लड़ा जाना चाहिए? क्या कोई धर्म-संप्रदाय, जाति-गोत्र, क्षेत्र-राज्य या देश मानव अस्तित्व को बचाने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है?

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