बिहार के पूर्णिया में आधी रात को फहराया जाता है झंडा, 1947 से चली आ रही है परंपरा

बिहार के पूर्णिया में आधी रात को फहराया जाता है झंडा, 1947 से चली आ रही है परंपरा

आजादी के साल 1947 से लगातार हर साल पूर्णिया के भट्ठा बाजार स्थित झंडा चौक पर रात के 12 बजकर 01 मिनट पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है।

पटना। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आज देश भर में ध्वजारोहण के कार्यक्रम हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र ने आज सुबह साढ़े सात बजे के करीब ही लाल किले पर झंडा फहरा दिया था। हर कोई ये सोच रहा होगा कि पीएम मोदी ने ही देश में सबसे पहले ध्वजारोहण किया होगा, लेकिन ऐसा नहीं है। बिहार का पूर्णिया जिला ऐसा है, जहां पर आधी रात को ध्वजारोहण किया जाता है और ये हर साल का है। पंजाब के वाघा बॉर्डर के बाद पूर्णिया देश की दूसरी ऐसी जगह है, जहां मध्य रात्रि में तिरंगा फहराया जाता है।

पूर्णिया के भट्टा बाजार में फहराया जाता है आधी रात को झंडा

आजादी के साल 1947 से लगातार हर साल पूर्णिया के भट्ठा बाजार स्थित झंडा चौक पर रात के 12 बजकर 01 मिनट पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है। हर साल की तरह इस साल भी पूर्णिया के सामाजिक कार्यकर्ता विपुल सिंह ने झंडा चौक पर तिरंगा फहराया। इस मौके पर कई जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और सदर विधायक विजय खेमका ने झंडे को सलामी दी।

1947 से चली आ रही है परंपरा

विपुल सिंह कहते हैं कि साल 1947 में जब घड़ी की सुई 12 बज कर 01 मिनट पर पहुंची, ठीक उसी समय भारत के आजादी की घोषणा रेडियो पर की गई थी। उसी समय पूर्णिया के स्वतंत्रता सेनानी और उनके दादा रामेश्वर प्रसाद सिंह, रामरतन साह और शमशुल हक के साथ मिलकर मध्य रात्रि में भट्ठा बाजार में झंडा फहराया था। तभी से हर साल यहां मध्य रात्रि में झंड फहराने की परंपरा चली आ रही है।

स्थानीय लोग भी आधी रात को ध्वजारोहण में होते हैं शामिल

इस पर सदर विधायक विजय खेमका ने कहा कि यह पूर्णिया ही नहीं, बल्कि बिहार के लिये गौरव की बात है। पूरे देश में आज भी वाघा सीमा के बाद पूर्णिया के झंडा चौक पर मध्य रात्रि को सबसे पहले झंडोत्तोलन किया जाता है। भट्टा बाजार के झंडा चौक पर स्थानीय लोग भी आधी रात को इकट्ठा हो जाते हैं। सामाजिक कार्यकर्ता आजाद सिंह पटेल और दिलीप कुमार दीपक ने कहा कि उनके परिजनों ने जैसे ही रेडियो पर देश की आजादी की घोषणा सुनी तभी रात के बारह बजकर एक मिनट पर यहां झंडोत्तोलन किया था। तब से यह परंपरा चली आ रही है।

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