Lockdown 2.0 में भूख की कहानी : 2500 रुपए में फोन बेचकर खरीदा राशन व पंखा, फिर उसी में लटकर लगा ली फांसी

Highlights

-लॉकडाउन की वजह से दिहाड़ी मजदूरी करने वाले, फुटपाथ पर रहने, गरीब और असहाय लोगों की परेशानी बढ़ गई है

-सब कुछ बंद होने के कारण लोगों को खाना तक नहीं मिल पा रहा है

-सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी उन तक खाना नहीं पहुंच पा रहा है


नई दिल्ली. देश में कोरोना के मामलों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। देशभर में अबतक 9300 से ज्यादा लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो चुके हैं। लॉकडाउन की वजह से दिहाड़ी मजदूरी करने वाले, फुटपाथ पर रहने, गरीब और असहाय लोगों की परेशानी बढ़ गई है। सब कुछ बंद होने के कारण लोगों को खाना तक नहीं मिल पा रहा है। सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी उन तक खाना नहीं पहुंच पा रहा है। खाने के लाले पड़ गए हैं। ताजा मामला है गुड़गांव का है, जहां लॉकडाउन के बाद बिहार का रहने वाला एक 35 वर्षीय प्रवासी मजदूर छाबु मंडल परिवार के साथ फंस गया। शहर में पेंटर का काम करने वाले छाबु ने अपने 8 लोगों के परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपना मोबाइल फोन ही बेच दिया और इससे मिले 2500 रुपए की बदौलत जरूरत का सामान जुटाया। इसके बाद जैसे ही परिवार के सदस्य बाहर गए, छाबु ने घर को अंदर से बंद कर फांसी लगा ली।

मोबाइल बेच कर राशन व खरीदा पंखा

छाबु की पत्नी पूनम के मुताबिक, मोबाइल बेचने के बाद पति को जो पैसे मिले थे, उससे उन्होंने घर के लिए एक पोर्टेबल पंखा और कुछ राशन खरीदा। घर में छाबु के माता-पिता और चार बच्चे हैं, जिनमें सबसे छोटे बेटे की उम्र महज 5 महीने है। पूनम का कहना है कि जब छाबु कुछ लेकर लौटे तो सभी खुश थे, क्योंकि बुधवार से ही किसी ने खाना नहीं खाया था। इससे पहले भी वे सब पड़ोसियों की दया पर ही निर्भर थे। पूनम बताती हैं कि खाना बनाने से पहले वे पास ही बाथरूम गईं, इस दौरान उनकी मां ने बच्चों क संभाला और घर के बाहर एक पेड़ के पास बैठ गईं। बगल की झोपड़ी में छाबु के पिता सो रहे थे। परिवार के सदस्यों के बाहर जाने के दौरान ही छाबु ने झोपड़ी का दरवाजा बंद किया और एक रस्सी के सहारे खुद को फांसी लगा ली।

आठ लोगों का खाना जुटाने में होती थी दिक्कत

पूनम कहती हैं कि लॉकडाउन शुरू होने के बाद से ही उनके पति काफी परेशान थे, आठ लोगों के परिवार के लिए उन्हें खाना जुटाने में काफी दिक्कत हो रही थी, क्योंकि इस दौरान न उनके पास काम था और न ही पैसा। सभी लोग मुफ्त के खाने पर निर्भर थे, लेकिन यह भी उन्हें रोज नहीं मिल पाता था।

मानिसक रूप से परेशान था छबु

इस मामले में गुड़गांव पुलिस का कहना है कि मंडल मानसिक रूप से परेशान था। हमें घटना की जानकारी गुरुवार सुबह ही मिली। उसका शव उसके परिवार को दे दिया गया, लेकिन वे इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं चाहते। मामले में कोई एफआईआर भी दर्ज नहीं हुई है। वहीं, जिला प्रशासन के अधिकारियों के मुताबिक, छाबु मानसिक रूप से परेशान था।

Ruchi Sharma
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