मुहर्रम के दिन खून बहाकर शोक प्रदर्शन नहीं करते यहां के लोग, इसके पीछे की वजह है खास

सामाजिक और मानविकता के दूष्टिकोण से ये काम वाकई में काबिले तारीफ है

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Published: 10 Feb 2018, 05:16 PM IST

नई दिल्ली। अनेकता में एकता का प्रदर्शन करता है भारत, हर जाति सम्प्रदाय के लोग मिलजुल कर रहते है यहां। उत्सव भी लोग साथ-साथ मनाते हैं। उत्तरी गुजरात में भी हर धर्म और जाति के लोग रहते हैं लेकिन बात आज होगी यहां पर रहने वाले इस्लाम सम्प्रदाय के लोगों के बारे में, उनके द्वारा मनाए जाने वाले एक उत्सव के बारे में।

हम जानते हैं कि मुहर्रम का दिन मातम का होता है। इस दिन हर तरफ लोग शहीद कर्बला की याद में खुद को जंजीरों और चाकूओं से घायल करते हैं या फिर अंगारों पर चलते हैं और इस तरह शोक का प्रदर्शन करते हैं।

Blood donation

मुहर्रम के दिन हर तरफ मातम की चीखें होती है लेकिन उत्तरी गुजरात के सबकांता जिले की बात इस मामले में अलग है क्योंकि यहां सियां सम्प्रदाय के लोग ऐसा नहीं करते क्योंकि इस इलाके में मुहर्रम के जुलूस के का नेतृत्व करने वाले शिया जाफरी मश्यकी मोमिन जमत ने ये फैसला लिया कि पैगम्बर मोहम्मद के दामाद इमाम हुसैन के बलिदान पर वो खून बहाने और खुद को घायल नहीं करेंगे बल्कि इसके विपरीत इस गांव के मुस्लिम मुहर्रम के दिन ब्लड डोनेट करेंगे। कुछ इस तरह यहां इस खास मुहिम की शुरूआत की गई है।

Blood donation

शिया जाफरी मश्यकी मोमिन जमत का कहना है कि पिछले साल मुहर्रम के दिन यहां के लोगों ने 2800 ब्लड यूनिट को एकत्रित किया। सामाजिक और मानविकता के दूष्टिकोण से ये काम वाकई में काबिले तारीफ है क्योंकि अकसर सही समय पर और सटीक ब्लड गु्रप के न मिल पाने से लोगों की मौत हो जाती है, ऐसे में सबकांता जिले की ये मुहिम कई लोगों की जान बचाएगी और इससे ज्य़ादा बढ़कर और क्या हो सकता है। इस गांव में मुर्हरम के दिन लोग इस तरह नई बनाई गई रीतियों का पालन करते हैं और ऐसा करने से इन्हें बहुत सुकून मिलता है।

 

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