अमेरिकी दादागिरी को टक्कर देने का मोदी सरकार पर बढ़ रहा दबाव

अमेरिकी दादागिरी को टक्कर देने का मोदी सरकार पर बढ़ रहा दबाव

भारत ने तुरंत अपनी लड़ाई नहीं लड़ी तो लाखों टीबी मरीजों का सस्ती दवा का हक हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।

अमेरिका अपनी दवा कंपनियों के मुनाफे की खातिर भारत जैसे विकासशील देशों के लाखों टीबी मरीजों की जान जोखिम में डालने की तैयारी कर चुका है। ऐसे में इससे मुकाबले के लिए भारत सरकार पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। टीबी के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की ओर से अगले महीने पहली बार राजनीतिक घोषणापत्र जारी होने वाला है। इसके मसौदे में अमेरिकी दबाव में सस्ती दवा का प्रावधान हटा दिया गया है।

मसौदे में किए गए इस बदलाव के खिलाफ भारत का पक्ष मजबूती से रखने के लिए अब अलग-अलग पार्टियों के कुछ सांसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जल्दी ही पत्र लिख कर अपील करने जा रहे हैं। पिछले दिनों राज्य सभा में सत्ता पक्ष के समर्थन में वोट डाल चुकी पार्टी के एक सांसद भी इसमें शामिल हैं। इससे पहले दो दर्जन से ज्यादा लोक स्वास्थ्य संगठनों और ढाई दर्जन से ज्यादा स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर तुरंत दखल देने को कहा है। दुनिया में सबसे ज्यादा जान लेने वाली संक्रामक बीमारी टीबी है और इसके सबसे ज्यादा 26 फीसदी रोगी भारत में ही हैं।

दुनिया भर में विरोध की आवाज

अंतरराष्ट्रीय संगठन ‘एमएसएफ’ (डॉक्टर्स विदाउट बोर्डर्स) ने भी इसे अमेरिकी दादागिरी करार दिया है। यहां तक कि खुद अमेरिका के डेढ़ दर्जन संगठनों ने इस संबंध में विकासशील देशों का ध्यान रखने की अपील की है। अमेरिकी दादागिरी के खिलाफ दक्षिण अफ्रीका पहले ही खुल कर खड़ा हो चुका है। इसने 24 जुलाई को बकायदा संयुक्त राष्ट्र के राजनीतिक घोषणापत्र की मौन प्रक्रिया (साइलेंस प्रोसीजर) को तोड़ते हुए कहा है कि वह अपने लाखों मरीजों की जिंदगियों को दाव पर नहीं लगा सकता।

 

कैसे प्रभावित होंगे मरीज

संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की ओर से सितंबर में ‘टीबी के विरुद्ध युद्ध का राजनीतिक घोषणापत्र’ जारी किया जाना है। इसके लिए पिछले कई महीनों से सदस्य देशों के बीच बैठकों का दौर जारी है। ‘पत्रिका’ के पास उपलब्ध 20 जुलाई को हुई इसकी पिछली बैठक के मसौदे में इससे ट्रिप्स (बौद्धिक संपदा अधिकार के व्यापारिक पहलू) संबंधी छूटों को हटा दिया गया है। पहले की सभी बैठकों में ये शामिल थे। ये प्रावधान विकासशील देशों को छूट देते हैं कि कोई दवा पेटेंट की वजह से बहुत महंगी हो तो वे उन्हें अनिवार्य लाइसेंसिंग प्रावधान में शामिल कर सकते हैं। ऐसे में कंपनियां इन्हें बेहद सस्ते में उपलब्ध करवा देती हैं।

सरकार का दावा, संघर्ष जारी है
मरीजों के लिए ट्रिप्स संबंधी छूट बेहद जरूरी हैं। मगर इस संबंध में भारत सहित सभी विकासशील देश अपना पक्ष मजबूती से रख रहे हैं।
- विकास शील, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव


भारत के लिए क्यों अहम-

-भारत ने 2025 तक टीबी मुक्ति का लक्ष्य रखा

-दुनिया के सबसे ज्यादा 26 प्रतिशत मरीज भारत में ही हैं

-28 लाख मरीजों में अधिकांश बेहद गरीब हैं

-टीबी की नई दवाएं इतनी महंगी होंगी कि सरकारी खरीद मुश्किल होगी

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