Jammu and Kashmir: सेवानिवृत्त गोरखा सैनिक अब घाटी में बना सकेंगे अपना आशियाना

  • जम्मू-कश्मीर में गोरखा सैनिकों ( indian army gorkha ) का डेढ़ सदी पुराना संघर्ष ( property in jammu and kashmir ) हुआ खत्म।
  • बीते सप्ताह से मूल निवास प्रमाण पत्र ( Jammu and Kashmir domicile ) जारी कर रहा है प्रशासन ( Jammu and Kashmir administration )।
  • डोमिसाइल के आवेदकों ( domicile certificates ) में रिटायर्ड गोरखा सैनिकों-अफसरों ( retired army personnel ) की काफी संख्या।

 

जम्मू। जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन ( Jammu and Kashmir administration ) ने पिछले एक सप्ताह में मूल निवास प्रमाण पत्र ( Jammu and Kashmir domicile ) जारी करना शुरू कर दिया है। भारी संख्या में सेवानिवृत्त गोरखा सैनिकों ( indian army gorkha ) और अधिकारियों समेत साढ़े छह हजार से ज्यादा लोगों को यह दस्तावेज मिल गया है। अब यह लोग केंद्र शासित प्रदेश में अपना आशियाना ( property in jammu and kashmir ) बनाने के साथ ही नौकरियों में आवेदन करने के योग्य हो गए हैं।

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जम्मू के अतिरिक्त उपायुक्त (राजस्व) विजय कुमार शर्मा ने कहा बताया कि 5,900 से ज्यादा प्रमाण पत्र पहले ही जारी किए जा चुके हैं। कश्मीर में लगभग 700 प्रमाण पत्र जारी किए गए हैं। इनमें से कई पूर्व ( retired army personnel ) गोरखा सैनिक और अधिकारी हैं।

जम्मू स्थित बहू के तहसीलदार डॉ. रोहित शर्मा ने बताया कि अकेले उनकी तहसील में गोरखा समुदाय के लगभग 2,500 लोग हैं, जिन्होंने भारतीय सेना में सेवा की थी और उनके परिवारों को मूल निवास प्रमाण पत्र ( domicile certificates ) मिला है। इसके लिए लगभग 3,500 ने आवेदन किया था। इनमें कुछ लोग वाल्मीकि समुदाय से भी हैं।

बीते 18 मई को जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन द्वारा मूल निवास नियमों को अधिसूचित किया गया था। इसमें एक धारा लगाई गई थी कि 15 दिनों में प्रमाण पत्र प्रदान नहीं करने वाले अधिकारियों (तहसीलदार) को 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। अधिसूचना के मुताबिक गैर-स्थानीय लोग जो 15 साल से जम्मू-कश्मीर में रहते थे, उनके बच्चे, केंद्र सरकार और केंद्रीय संस्थानों के अधिकारी और सात साल तक जम्मू-कश्मीर में अध्ययन करने वाले और दसवीं या बारहवीं की परीक्षा में बैठने वाले सभी यहां के निवासी बनने के हकदार बन गए।

गौरतलब है कि सरकार के इस फैसले ने गोरखा समुदाय के दशकों पुराने संघर्ष को समाप्त कर दिया है। करीब डेढ़ शताब्दी से यहां रहने वाले गोरखा समुदाय के लोगों ने तकरीबन यहां का निवासी बनने की उम्मीद ही छोड़ दी थी।

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68 वर्षीय प्रेम बहादुर ने मीडिया से बातचीत में बताया कि उनके पिता हरक सिंह यहां के तत्कालीन शासक महाराजा हरि सिंह की सेना में थे। उसके बाद उनके भाई ओमप्रकाश और उन्होंने गोरखा राइफल्स में नियुक्ति हासिल की। प्रेम बहादुर हवलदार के पद से सेवानिवृत्त हुए जबकि भाई अभी लेफ्टिनेंट हैं।

उन्होंने कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद वह नौकरी-एडमिशन-संपत्ति के मालिकाना हक के लिए जरूरी पीआरसी के लिए प्रतिवर्ष यहां स्थायी आवास प्रमाणपत्र अप्लाई करते थे। हालांकि इसका कोई इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था। लेकिन उन्हें खुशी है कि उनका एमबीए पास बेटा अब सरकारी नौकरी के लिए राज्य में आवदेन कर सकेगा।

अमित कुमार बाजपेयी
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