प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश केस पर अब सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच करेगी फैसला

Mohit sharma

Publish: Oct, 13 2017 09:20:18 AM (IST) | Updated: Oct, 14 2017 03:22:09 PM (IST)

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प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश केस पर अब सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच करेगी फैसला

सबरीमाला के इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक है, जिसको लेकर गैर-बराबरी के खिलाफ राज्य में आंदोलन अब भी चल रहा है।

नई दिल्ली। केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक के मामले में आज सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केस संवैधानिक बेंच को सौंप दिया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूछे गए कई सवालों पर संविधान पीठ को विचार करना होगा, जिनमें यह सवाल भी शामिल है कि क्या मंदिर महिलाओं का प्रवेश रोक सकता है। सबरीमाला के इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक है, जिसको लेकर गैर-बराबरी के खिलाफ राज्य में आंदोलन अब भी चल रहा है। जबकि मंदिर में पूछा पाठ के लिए अपने हक को पाने के लिए महिला संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर कर किया था।

तो इसलिए लगाई गई महिलाओं के प्रवेश पर रोक

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश संंबंधी मामला सुनवाई पर आ गया है और मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा और न्यायधीश आर भानूमति व अशोक भूषण का पैनल आज इस मामले में अपना फैसला सुनाएगा। बता दें इससे पहले शनि शिंगणापुर मंदिर और हाजी अली दरगाह में प्रवेश पाने की लड़ाई महिलाएं जीत चुकी हैं सबरीमाला में प्रवेश संबंधी याचिका हालांकि केरल हाईकोर्ट । 1990 में परंपरा का हवाला देकर ठुकरा चुका है। वहीं त्रावणकोर देवास्वम बोर्ड की दलील है कि अयप्पा चूंकि नैश्ठिक ब्रह्मचारी हैं इसलिए 10 से 50 साल के बीच उम्र की महिलाओं को मंदिर में नहीं घुसने दिया जा सकता। बोर्ड का दावा है कि उम्र के इस पड़ाव में महिलाएं चूंकि रजस्वला होती हैं इसलिए मंदिर में उनके प्रवेश से ब्रह्मचारी अयप्पा की मर्यादा भंग हो जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि इन दलीलों को संवैधानिक लैंगिक समानता के प्रावधान के सामने पहली नजर में बेबुनियाद पाया है मगर अंतिम निर्णय बाकी है।

सरकार ने किया महिलाओं का समर्थन

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई के दौरान इस साल फरवरी में अपना फैसला सुरक्षित रखा था। वरिष्ठ काउंसल केके वेणुगोपाल जो त्रावणकोर देवसम बोर्ड के लिए उपस्थित हुए थे ने कोर्ट को बताया कि यह मुद्दा अधिक जटिल है और सविंधान के अनुच्छेद 145 (3) के तहत इसकी व्याख्या की गई है। उन्होंने कोर्ट से इस मामले में फैसला सुनाने के लिए कम से कम पंाच सदस्यी जज पैनल की सिफारिश की थी। उन्होंने कोर्ट के समक्ष तर्क दिया कि इसके लिए अनुच्छेद 26 की व्याख्या की आवश्यकता होगी, जो एक धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों से संबंधित है, और अनुच्छेद 25, जो अंतरात्मा की स्वतंत्रता और स्वतंत्र पेशे, धार्मिक प्रक्रिया और प्रचार की गारंटी देता है। वहीं राज्य की एलडीएफ सरकार ने 2007 में मंदिरों में महिलाओं के सभी आयु वर्गों के प्रवेश का समर्थन किया था, लेकिन यूडीएफ सरकार ने बाद में इसका विरोध किया। लेकिन जब एलडीएफ ने 2016 में सत्तावापसी की तो उसने अपना पुराना निर्णय लागू रखा। विभिन्न समूहों द्वारा इस मामले में कई आवेदन दर्ज किए गए हैं। जबकि महिला कार्यकर्ताओं ने इस प्रक्रिया को भेदभाव पूर्ण करार दिया है।

 

 

 

 

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